झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १४६ [ ३० ] हाट का दिन था । झांसी के निकटवर्ती गांवो से बहुत लोग आये थे । बाजार में झांसी के भविष्य की क्या चर्चा है, इसके जानने के लिये, वे उत्सुक थे । हलवाईपुरा झांसी का सबसे बडा बाजार था । ग्रामीण इसको 'मिठियाई' कहते थे । हलवाइयो की दूकाने एक सिरे पर थी । दूसरे सिरे पर एक दिशा में 'मुरली मनोहर' का मन्दिर और सामने मन्दिर का नक्कारखाना । मन्दिर में मूर्ति राधाकृष्ण की थी—और है । मन्दिर कहलाता लक्ष्मीबाई का है, इसमें दर्शन करने के लिये लक्ष्मीबाई नियम से जाया करती थी । हलवाइयो की दूकानो और मुरली मनोहर के मन्दिर के बीच के सिलसिले में, अनेक प्रकार की दूकाने थी । बीच मे मार्ग काफी चौडा । पश्चिम की ओर मार्ग दो फन्सो में फूटा है, एक हवेली और किले की ओर, और दूसरा दतिया फाटक को । हाट के दिन इस सम्पूर्ण मार्ग पर बहुत चहल पहल पर रहती थी,। स्त्रिया और पुरुष आजादी के साथ अपना सौदा खरीद रहे थे और बातचीत कर रहे थे । खुदाबख्श और पीरअली बाजार मे साथ थे । कपडे की दूकान से कुछ कपडा मोल लेकर एक देहाती ने दूकानदार से पूछा, 'काये जू अब झांसी में का होने ?' 'जो होत आओ है सो हुइये' उत्तर मिला । 'हम गाव वारे इतनीई में समझ जात होते तो का हती । तनक उल्था करके बताओ ।' तीन चार देहाती वहा और आ गये । बिक्री की आशा से दूकानदार का मन वढा । बातचीत का सिलसिला चला । 'महाराज ने स्वर्गवास के पैले कुँअर गोदी लएते सो सबरो संसार जानत । वा गोद के मनवावे के लाने उनने अपने सामने अर्जी लाट साब लो पहुँचा दईती । अबै ऊतर नई आओ ।'