झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ झाँसी की रानी । है । जनता सब कुछ है । जनता अमर है । इसको स्वराज्य के सूत्र में बाधना चाहिये । राजाओ को अङ्गरेज भले ही मिटादे, परन्तु जनता को नही मिटा सकते । एक दिन आवेगा जब इसी जनता के आगे होकर मैं स्वराज्य की पताका फहराऊँगी ।' सहेलियो की आखो में भी चमत्कार उत्पन्न हो गया । रानी बोली । 'मुझ से आज एक भूल हो गई है । मुझको एलिस के सामने कुछ नही कहना चाहिये था । मेरे उस वाक्य से वह अपने सङ्गी अङ्गरेज़ो सहित चौकन्ना हो जागया । वृत्ति भी अस्वीकृत नही करना चाहिये थी ।' काशी ने स्थिर स्वर मे प्रश्न किया, 'अब क्या करना है ?' रानी ने कहा, 'अङ्गरेज़ जाति बहुत धूर्त है । उसका सामना चाणक्य नीति ही से हो सकता है। मै वृत्ति को स्वीकृत करूँगी और आगे सावधानी के साथ काम करूंगी । मैं दामोदरराव की ओर से विनय प्रार्थना की लिखा पढी जारी रक्खूँगी । विलायत में अपील भिजवाऊँगी । जिसमे एलिस इत्यादि मेरी झाँसी न देने वाली बात की यथार्थता को अपनी समझ से दूर कर दे और, जनता अपनी स्मृति में इस बात को पकडे रहे, कि मै और झासी अभी बनी हैं ।' इतने मे वहा दामोदरराव आया । रानी ने अपनी गोद में बिठला लिया । दामोदरराव ने पूछा, 'माता, क्या यह राज्य चला जावेगा ?' रानी—'यह राज्य चला जावेगा तो चला जाने दो । स्वराज्य आवेगा ।' दामोदरराव --'स्वराज्य क्या ?' रानी मुस्कराई । बोली, 'अभी भोजन करने चलो । फिर कभी बतलाऊँगी ।' रानी ने पैन्शन लेने की स्वीकृति लिखवा भेजी ।