झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १६३ मारे गये, साहू समाप्त, राजाराम गत तब ताराबाई की गाठ में क्या रह गया था ? इतने बड़े मुगल सम्राट को ताराबाई कैसे परास्त कर सकी ? उसने स्वराज्य की बागडोर को कैसे बढ़ाया ? रो-रोकर ? कपड़े और गहने फेक-फेककर ? भूखो मर मर कर ? और सोचो, जीजाबाई को पति का सुख नही मिला । उन्होने छत्रपति को पाला । काहे के लिये ? किस आशा से ? गद्दी पर विठलाने के लिये ? उन्होने इतना तप, इतना त्याग अपने पुत्र को केवल हाथी की सवारी और नरम नरम गद्दी पर विराजमान कराने के लिये किया था ?' वे सहेलिया सचेत हुई । रानी कहती गईं, 'हमको जो कुछ करना है उसकी दिशा निश्चित है । मार्ग में विघ्न बाधाये तो आती ही हैं । खरीते का स्वीकृत न होना केवल एक बाधा ही है । स्वीकृत हो जाता तो क्या हम लोग केवल सो जाने के लिये ही जीवित रहती ? भगवान कृष्ण की आज्ञा को याद रक्खो कि हमको केवल कर्म करने का अधिकार है । कर्म के फल का नही । देखो, छत्रपति के उपरान्त जिन लोगो ने स्वराज्य के आदर्श को आगे बढ़ाया और उसकी जडे प्रबल बनाई, वे बाधाओ को डटकर प्रतिरोध करते रहते थे । जिन लोगो की लालसा अपने लिये फलो की ओर गई, वे गिर गये और स्वराज्य की धारा धीमी पड़ गई । परन्तु वह सूखी कभी नही । दादा बाजीराव पेशवा हतप्रभ होकर बिठूर चले आये । परन्तु हम लोगो को वे स्वराज्य की शिक्षा देने से कभी नही चूके । यदि हिन्दुस्थान में कोई भी उस पवित्र काम को अपने हाथ मे न ले, तो भी, मैने अपने कृष्ण के सामने, अपनी आत्मा के भीतर उसका बीड़ा उठाया है । करूँगी और फिर करूँगी । चाहे मेरे पास खडे होने के लिये हाथ भर भूमि ही क्यो न रह जाय । मानलो कि मैं सफल न हो पाई, तो भी जिस स्वराज्य धारा को आगे बढ़ा जाऊँगी, वह अक्षय रहेगी । उसी महावाक्य को सदा याद रक्खो—हमको केवल कर्म करने का अधिकार है, फल का कभी नही । हमको एक बड़ा सन्तोष है । जनता । हमारे साथ