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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१६२ झांसी की रानी [ ३३ ] एलिस ने झांसी का 'अङ्गरेजी बन्दोबस्त' आरम्भ कर दिया । दीवान से दफ्तरो की चाभिया लीं। थाने पर अधिकार किया और शहर में अङ्गरेजी राज्य और अपने अधिकार की डोडी पिटवा दी । तहसीलो मे तुरन्त समाचार भेजा और वहा भी कडे प्रबन्ध की व्यवस्था कर दी । दीवान रानी को सब बातो की सूचना देकर अपने घर उदास चला गया। रानी के नित्य नियम मे कोई अन्तर नही आया। अपने कार्य- क्रम के अनुसार जब वे विश्राम के लिये बैठी तब मुन्दर, सुन्दर और काशीबाई उनके पास आ गई । वे अपने आभूषण उतार आई थी । रानी ने कहा, 'आभूषण क्यो उतार आई हो ? क्या इसी समय रणभूमि में चलना है ?' मुन्दर सिसकने लगी । सुन्दर और काशी के नेत्र तरल हो गये । रानी बोली, 'ये चिन्ह ,तो असमर्थता और अशक्ति के हैं। अपने सब आभूषण पहिनो और इस प्रकार रहो मानो कुछ हुआ ही नही है।' मुन्दर ने रानी के पैर पकड लिये उसको हिलकी नही समाती थी । रानी का कठ भी थोडा रुद्ध हुआ। उन्होने भौहे सिकोडी। एक ओर देखने लगी । काशीबाई रुदन करती हुई,बोली, 'वाईसाहब, बाईसाहब !' सुन्दर ने करुण स्वर में कहा, 'सरकार अब क्या होगा ? रानी ने अपने को सहज ही संयत कर लिया । मुन्दर के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आंखे आसुओ से भरी हुई थी । सुन्दर और काशी की भी। चंचल आसुओ में होकर उन तीनो ने रानी के तेजस्वी रूप को देखा-कई लक्ष्मीबाईया, कई सतेज नेत्र दिखलाई पडे । उन्होने अपनी आंखे' पोछीं । रानी ने कहा, 'ये आसू बल का क्षय करेगे। अभी तो अपने कार्य का प्रारम्भ भी नही हुआ है। सोचो, जब छत्रपति के उपरान्त शम्भू जी