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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

लक्ष्मीबाई १६१ एलिस का वाक्य समाप्त नही हुआ था कि पर्दे के पीछे से रानी ने उसी ऊंचे मधुर स्वर में कहा, 'मुझको यह वृत्ति नही चाहिये, मै न - लूंगी।' एलिस ने अधिक ठहरना उचित नही समझा। दीवान से कहता गया, आप तुरन्त मेरे पास आइये।' दीवान ने पान खाने का आग्रह किया। वह पान खाकर चला गया। मुन्दर रानी के पास पर्दे में बैठी थी। जब घोषणा सुनाई गई वह मूर्छित हो गई थी। एलिस के चले जाने पर वह होश में आई। रानी ने कहा, 'क्यो री मूर्छित होना किससे सीखा ? क्या इस छोटे से राज्य के लिये हम लोग जीवत हैं ?' मुन्दर रोने लगी। रानी ने पुचकारा। मोरोपन्त इत्यादि ने समझाया। दीवान ने रानी से पूछा, 'मैं एलिस साहब के पास जाऊँ ? वह बुला गये हैं।' रानी अनुमति देकर रनवास में चली गई। कुछ क्षणो मे ही समाचार सारे नगर में फैल गया। उस समय झासी निवासियो के क्षोभ का ठिकाना न था। रानी की सेना तुरन्त युद्ध छेड देना चाहती थी, परन्तु रानी ने निवारण किया। कहलवाया, 'अभी समय नही आया है।' झलकारी ने जब सुना अपने पति पूरन से कहा, 'छाती वर जाय इन अङ्गरेजन की, गटक लई झासी।'