भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

१६० झाँसी की रानी एलिस ने जेब से मालकम वाली घोषणा निकाली। दरबारियो के कलेजे धक धक करने लगे। कलेजा थाम कर उन लोगो ने घोषणा को सुन लिया। गुलाम गौस खा तोपची अनुकूल घोषणा की आशा से दीवान खास के एक दर के पीछे की तरफ कान लगाये खडा था। प्रतिकूल घोषणा को सुनकर मुँह लटकाये चुपचाप चला गया। जब घोषणा पढ़ी जा चुकी—मोरोपन्त के मुँह से निकला, 'ओफ !' दीवान के मुँह से, 'हाय !' और दरबारियो के मुँह से—'अनहोनी हुई।' दामोदरराव समझने की कोशिश कर रहा था, उसको आभास मिल गया कि कुछ बुरा हुआ है। यकायक ऊँचे परन्तु मधुर स्वर में रानी ने पर्दे के पीछे से कहा, ॥'मै अपनी झासी नही दूगी।'* इन शब्दो से दीवान खास गूँज गया। वायुमण्डल ने उनको अपने भीतर निहित कर लिया। भारत के इतिहास मे वे शब्द पिरो दिये गये। झासी की कलगी में वे शब्द मणि-मुक्ता बन कर चिपक गये। अब एलिस का धड़कता हुआ हृदय कुछ स्थिर हुआ। बोला, 'मुझको गवर्नर जनरल साहब की जो आज्ञा मालकम साहब के द्वारा मिली उसको मैने पेश कर दिया। जो कुछ मेरे सामर्थ्य में था मैने किया। हम सब गवर्नर जनरल साहब की आज्ञा में बधे हुये हैं। परन्तु मै समझता हूँ कि असन्तोष का कोई कारण नही है। पाच हजार रुपया मासिक वृत्ति महारानी साहब और उनके कुटुम्ब के लिये काफी है। यह मानना पड़ेगा कि गवर्नर जनरल साहब ने बहुत उदारता का बर्ताव किया है।'

  • परिशिष्ट देखिये।