झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १५६ [ ३२ ] मालकम ने इस घोषणा को बहुत छिपा-लुका कर एलिस के पास भेजा और उसको हिदायत की कि बहुत सावधानी के साथ काम किया जावे, क्योकि उसे मालूम था कि रानी जन-प्रिय हैं, कही झासी की जनता दगा-फसाद न कर बैठे । इसलिये एलिस ने सेना द्वारा झासी का कठोर प्रबन्ध किया। एलिस ने होशियारी के साथ उस घोषणा को एक जेब में रक्खा और दूसरी में पिस्तौल । सशस्त्र अङ्गरक्षको साथ लेकर रानी के पास किले वाले महल में पहुचा । रानी को सूचना दे दी गई थी कि छोटे साहब के पास बडे लाट की आज्ञा आ गई है, उसी को सुनाने आ रहे हैं। मोरोपन्त इत्यादि बहुत दिन से आशा लगाये बैठे थे । दीवान खास में नियुक्त समय पर आ गये । रानी पर्दे के पीछे बैठी । दीवान खास में एक ऊँची कुर्सी पर दामोदरराव । एलिस दृढ पद और अदृढ हृदय के साथ दीवान खास में प्रविष्ट हुआ । मोरोपन्त इत्यादि ने बहुत विनीत भाव के साथ अभिवादन किया । दीवान खास मे इत्र-पान इत्यादि सजे सजाये रक्खे थे । बुर्जो पर तोपो में सलामी दागने के लिये बारूद डाल दी गई थी । एलिस ओठ से ओठ सटाये आया और अपने माथे की शिकनो को समेटकर अभिवादन का उत्तर देता हुआ बैठ गया । मोरोपन्त ने विनीत भाव के साथ कहा, 'साहब, आपको यहा तक आने में बहुत कष्ट हुआ होगा ।' मुश्किल से एलिस का कण्ठ मुखरित हुआ, 'मेरा कर्तव्य है। दुःखदायक कर्तव्य है।' सब लोग सन्नाटे में आ गये । एलिस ने कहा, 'महारानी साहब आ गई हैं ?' दीवान ने उत्तर दिया, 'जी साहब । पर्दे के पीछे विराजमान हैं।'