झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० . झाँसी की रानी [ ३ ] झाँसी की गद्दी पर राजा गंगाधरराव को बैठे और झाँसी-राज्य के शासन को अगरेजो द्वारा चलते सात-आठ साल हो गये। नगर का शासन गंगाधरराव के हाथ में था और बाकी राज्य का कम्पनी के कर्मचारियो के हाथ मे । चैत लग गया था। वसन्त ने पत्थरो और ककडो तक पर फुल- वाडियाँ पसार दी। टेसू के फूलो ने क्षितिज को सजा दिया और धरती पर रग-बिरंगे चौक पूर दिये। समीर और प्रभञ्जन में भी महक समा गई। रात और दिन संगीत से पुलकित हो उठे। उस रात नाटकशाला में 'रत्नावली' का अभिनय था। हिन्दी अनुवाद द्वारा । मोतीबाई को रत्नावली का रूपक करना था। निर्देशन स्वय राजा का । गायन-वादन और नृत्य बडे उस्तादो के दिग्दर्शन मे तैयार हुये थे। दर्शक सब निमन्त्रण पर आये थे। राजा गंगाधरराव सबसे आगे बैठे थे। उनकी आयु इस समय जीवन के लगभग बीचोबीच थी। सुन्दर, स्वस्थ और राजसी। पीछे, परन्तु पास ही उनके सगी खुदाबख्श, दीवान रघुनाथसिंह, राव दूल्हाजू, दीवान जवाहरसिंह इत्यादि दायें-बाये बैठे हुये थे। सब नौजवान । स्वास्थ्य और यौवन की उमगो में भरे हुये । मोतीबाई के छलकते मदमाते यौवन और सौन्दर्य को देखने के लिये आतुर । पर्दा खुला। सूत्रधार का मगल-गान हुआ। कुछ समय बाद रत्नावली की भूमिका में मोतीबाई इठलाती हुई रगमञ्च पर आई। खुदाबख्श के मुँह से यकायक 'वाह !' निकल पडा । मोतीबाई ने खुदा- बख्श को देखा । खुदाबख्श ने आँखे गडाई । जब-जब मोतीबाई रंगमञ्च पर जिस-जिस दृश्य मे आई उसने दर्शको पर से दृष्टि को समेट कर खुदाबख्श पर केन्द्रित किया । मोतीबाई ने नृत्य भी बहुत मोहक किया। नृत्य के समय चितवन की कोरो को मस्ती से भरने का प्रयत्न किया। और, पलको को अनेक