झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ११ बार अर्द्ध मुकुलित झपकियाँ दीं। खुदाबख्श के मुँह से फिर 'वाह!' निकली। राजा को अच्छा नही लगा। बोले, 'तुम मूर्ख हो। जिस रत्नावली का विवाह राजा के साथ होने वाली है उसको क्या वेश्याओ जैसा नयन मटकौयल करना चाहिये ?' दर्शको की सम्मति थी कि सारा नाटक सफल अभिनय और मनोहर गायन-वादन तथा नृत्य के साथ समाप्त हुआ है। दर्शक नाटकशाला के बाहर गये। राजा गङ्गाधरराव रंगमञ्च के शृङ्गार-कक्ष मे पहुँचे। मोतीबाई ने नत-मस्तक प्रणाम किया। उसको विश्वास था कि आज सब कार्य कलाके सर्वाङ्ग सहित पूरा किया है। प्रफुल्लता के मारे उसका चेहरा दमक रहा था। राजा के मुह से प्रशसा के दो शब्द सुनने की ललक थी। राजा ने कहा, 'आज क्या शराब पीकर आई थी ?' मोतीबाई सन्नाटे में आ गई। चेहरा उतर गया। जैसे एक दम कुम्हला गई हो। धीमे, कोमल, मधुर स्वर मे बोली, 'श्रीमन्त सरकार, मैने शराब तो कभी भी नही पी है। आज क्या पीती ?' 'फिर आंखो को आज इतना ढाल क्यो दिया ?' राजा ने प्रश्न किया। एक छोटी-सी आह को भीतर ही दबाकर मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'मै भूल गई।' राजा कुछ शान्त हुये। बोले, 'जिस भूमिका का अभिनय करना हो उसके चरित्र को कभी न भूलो। अभिनय सफल तभी कहावेगा जब पात्र अपने को तो विलकुल भूल जावे परन्तु अपनी भूमिका की एक-एक रेखा को अच्छी तरह स्मरण रक्खे। उसमे तन्मय हो जावे। मैने पहले भी बतलाया है। समझी ?' मोतीबाई के मन में एक प्रतिवाद उठा, परन्तु उसने अपने को पूरी तौर से सयत करके विनय की, 'हाँ सरकार। आगे कभी भूल न होगी।' राजा ने कहा, 'अब की बार कालिदास का अभिज्ञान शाकुन्तल होगा। तुमको शकुन्तला का अभिनय करना है।'