झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ झांसी की रानी मोतीबाई की उदासी चली गई। बालकों जैसी सरल प्रफुल्लता के साथ उसने कहा, 'महाराज मैं भरसक प्रयत्न करूंगी। सरकार के दिग्दर्शन का अपमान न होगा।' राजा प्रसन्न होकर चले गये। पात्रो और पात्रियो ने जय-जयकार किया, 'श्रीमन्त सरकार महाराजा गङ्गाधरराव बहादुर की जय।' नियुक्त तिथि और समय पर शकुन्तला नाटक का अभिनय हुआ। लगभग वे ही सब दर्शक उपस्थित हुये। आभूषण विहीन परन्तु पुष्पो से लदी हुई मोतीबाई तपोवन की सहेलियो के साथ बेलो और लताओ को सीचते ही दर्शको के मन को मद सा वितरित करने लगी। परन्तु खुदाबख्श उस रात की रत्नावली की प्रमत्त आँख की झलक देखने के लिये व्याकुल था। होते-होते नाटक के अन्तिम दृश्यो की बारी आई। सुरासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता करने के उपरांत दुष्यन्त लौटा। आश्रम मे सिंह के बच्चो के साथ खेलता हुआ लडका मिला। स्नेह उमड़ा बालक के हाथ से गडा खिसक गया। दुष्यन्त ने उठा लिया। गडा साँप के आकार में परिवर्तित नही हुआ। इस व्यापार को देखने वाली शकुन्तला की एक सहेली को विस्मय हुआ। दुष्यन्त को उस बालक की माता का नाम मालूम हो गया। मलिन वेशधारिणी शकुन्तला भी बाल बिखेरे आश्रम से बाहर निकल आई। दुष्यन्त ने पहिचान लिया। उसको परिताप हुआ। शकुन्तला ने अपनी विपत्ति का कारण अपने दुर्भाग्य को बतलाया। परन्तु उससे दुष्यन्त को संतोष नही हुआ। क्षमा प्राप्ति और प्रायश्चित करने के लिये दुष्यन्त शकुन्तला के पैरो पर गिर पडा। दुष्यन्त के पैरो पर गिरते ही मोतीबाई की दृष्टि एक क्षण के लिये खुदाबख्श पर गई। उसकी आँखें तरल थी और अनेक दर्शक भी अपने आँसुओ से, मानो स्त्रियो के साथ किये गये दुर्व्यवहारो का प्रायश्चित कर रहे थे। मोतीबाई की आँखो में बड़े-बडे आँसू आ गये।