झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १३ गङ्गाधरराव ने खुदाबख्श की ओर गर्दन मोड़ी। कहा, 'क्यो रे कैसा रहा ?' मोतीबाई के आंखो के आसुओ की ओर जरा सी निगाह फिर डाल कर खुदाबख्श ने रुद्ध स्वर मे कहा, 'महाराज बहुत अच्छा 'पर आज 'वाह' 'वाह नही निकली ?' राजा ने पूछा। खुदाबख्श ज़रा झेपा। झेप को दबाने के लिये मुस्कराकर बोला, 'हुजूर उसके लिये कोई जगह नही पाई।' राजा इस बात को पीकर रह गये। खेल की समाप्ति पर दर्शक नाटक शाला के बाहर हुये और गङ्गाधरराव शृंगार कक्ष में। मोतीबाई अब भी मलिन वेश में थी। अभिनय के विषय में सम्मति सुनने के लिये प्रणाम करती हुई राजा के सम्मुख आई । उन्होने उसकी पीठ पर थपकी देकर शाबाशी दी। कहा, 'तुम्हारा आज का अभिनय बहुत अच्छा और स्वाभाविक रहा। कालिदास महान हैं। उन्होने उस समय शकुन्तला के हृदय को जो आँसू दिये थे, तेरे नेत्रो ने ब्याज के साथ लौटा दिये।' मोतीबाई प्रसन्नता के मारे फूल गई। बिना पुष्पो के ही पुष्पो से लदी जान पडी । राजा ने उसको एक बडा बाग जागीर में लगा दिया। ❊ दूसरे दिन राजा गङ्गाधरराव ने खुदाबख्श को राजदरबार से अलग कर दिया और घोषणा करवाई कि यदि खुदाबख्श फिर कभी झाँसी शहर में दिखलाई पडा तो उसके नगे शरीर पर कोडे लगाये जायँगे। लोगो को इस आज्ञा पर आश्चर्य था। परन्तु लोग राजा के सुलभकोपी स्वभाव को जानते थे, इसलिये किसी खास कारण को जानने की लालसा जनता के मन मे नही हुई। ❊यह बाग ओरछे दरवाजे के भीतर, दरवाजे से लगा हुआ था। आजकल इसके एक सिरे पर सडक के किनारे मसजिद है। बाकी में अब साग भाजी की खेती होती है।