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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१४ झाँसी की रानी दीवान रघुनाथसिंह और राव दूल्हाजू के मन में असली कारण के विषय में जो शका थी, उन्होने किसी पर प्रकट नही की। उन्होने सोचा कि इस नाटकशाला से दूर ही रहना चाहिये, परन्तु राजा के निमन्त्रण की अवज्ञा भी कैसे कर सकते थे ? मोतीबाई सावधानी और लगन के साथ नाटकशाला में काम करती रही। परन्तु दर्शको में खुदाबख्श को उसने फिर कभी नही देखा । और न कभी गङ्गाधरराव ने मोतीबाई को किसी विशेष दर्शक पर आँख को केन्द्रित करते पाया । इच्छा रखते हुये भी मीतीवाई रगमच पर फिर कभी बडे वडे आँसू नही निकाल सकी । इन दिनो नाटकशाला मे जुही नाम की एक अल्पवयस्का नर्तकी और आई । परन्तु उसको अपने घर पर नाचने गाने की और अधिक तालीम पाने की अनुमति मिल गई थी। जुही उनाव दरवाजे भीतर मेवातीपुरा के सिरे पर रहती थी। इसका भवन माधवराव भिडे के बाग से लगा हुआ था। उसने अभी अल्हडपन से बाहर कदम नही रक्खा था । रंगमच पर इसका नृत्य और गायन अधिक होता था, अभिनय कम ।