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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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उदय [ १ ] बर्षा का अन्त हो गया । कुवाँर उतर रहा था । कभी कभी झीनी झीनी बदली हो जाती थी । परन्तु उस सन्ध्या के समय आकाश बिलकुल स्वच्छ था । सूर्यास्त होने में थोडा सा विलम्ब था । बिठूर के बाहर गगा के किनारे तीन अश्वारोही तेजी के साथ चले जा रहे थे । तीनो बाल्यावस्था मे । एक बालिका, दो बालक । एक बालक की आयु १६, १७ वर्ष, दूसरे की १४ से कुछ ऊपर । बालिका की तेरह से कम । बडा बालक कुछ आगे निकला था कि बालिका ने अपने घोडे को एड लगाई । बोली, 'देखूँ कैसे आगे निकलते हो।' और वह आगे हो गई । बालक ने बढने का प्रयास किया तो उसका घोडा ठोकर खा गया, और बालक घडाम से नीचे जा गिरा । सूखी लकडी के टुकडे से उसका सिर भिड गया । खून बहने लगा । घोडा लौटकर घर की ओर भाग गया बालक चिल्लाया, 'मनू मे मरा।' बालिका ने तुरन्त अपने घोडे को रोक लिया । मोड़ा, और उस बालक के पास पहुंची । एक क्षण में तड़ाक से कूदी और एक हाथ से घोडे की लगाम पकडे हुये झुक कर घायल बालक को ध्यान पूर्वक देखने लगी ।