झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ झाँसी की रानी माथे पर गहरी चोट आई थी और खून बह रहा था । बालिका मिठास के साथ बोली, 'घबराओ मत, चोट बहुत गहरी नही है । लोहू बहने का कोई डर नही ।' मझला बालक भी पास आ गया । उतर पडा और विह्वल होकर अपने साथी की चोट को देखने लगा । 'नाना तुमको तो बहुत लग गई है ।' उस बालक ने कहा । 'नही, बहुत नही है' बालिका मुस्कराकर बोली, 'अभी लिये चलती हूँ । कोठी पर मरहम पट्टी हो जायगी और बहुत शीघ्र चंगे हो जायगे ।' 'कैसे ले चलोगी मनू ? बडे लडके ने कातर स्वर में कराहते हुये पूछा । मनू ने उत्तर दिया, 'तुम उठो । मेरे घोडे पर बैठो । मै उसकी लगाम पकडे तुम्हे अभी घर लिये चलती हू ।' 'मेरा घोडा कहाँ है ?' घायल ने उसी स्वर में प्रश्न किया । मनू ने कहा, 'भाग गया । चिन्ता मत करो । बहुत घोडे हैं । मेरे पर बैठो । जल्दी । नाना, जल्दी ।' नाना बोला, 'मनू में सध नही सकू गा ।' मनू ने कहा, 'में साध लू गी । उठो ।' नाना उठा । मनू एक हाथ से घोडे की लगाम थामे रही, दूसरे से उसने खून मे तर नाना को बिठलाया और बडी फुर्ती के साथ उचट कर स्वय पीछे जा बैठी । एक हाथ से घोडे की लगाम सभाली । दूसरे से नाना को थामा और गाव की ओर चल दी । पीछे पीछे मझला बालक भी चिन्तित, व्याकुल, चला । जब ये गाव के पास आगये तब कई सिपाही घोडो पर सवार इन बालको के पास आ पहुँचे । 'लगी तो नही ?' 'ओफ बहुत खून निकल आया है ।'