झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १७ 'आओ मै लिये चलता हूँ।' 'घर पर घोडे के पहुँचते ही हम समझ गये थे कि कोई दुर्घटना हो गई है।' इत्यादि उद्गार इन आगन्तुको के मुँह से निकले। इन लोगो के अनुरोध करने पर भी मनू नाना को अपने ही घोड़े पर सँभाले हुये ले आई। पहुँचते ही कोठी के फाटक पर एक उतरती अवस्था के और दूसरे अधेड वय के पुरुष मिले। दोनो त्रिपुण्ड लगाये थे। उतरती अवस्था वाला रेशमी वस्त्र पहिने था और गले में मोतियो का कठा। अधेड सूती वस्त्र पहिने था। उतरती अवस्था वाले को कुछ कम दिखता था। उसने अपने अधेड साथी से पूछा, 'क्या ये सब आ गये मोरोपन्त?' 'हा महाराज।' मोरोपन्त ने उत्तर दिया। जब वे बालक और निकट आ गये तब मोरोपन्त नामक व्यक्ति ने कहा, 'अरे यह क्या? मनू और नाना साहब दोनो लोहूलुहान हैं।' जिनको मोरोपन्त ने 'महाराज' कहकर सम्बोधन किया था, वह पेशवा बाजीराव द्वितीय थे। उन्होने भी दोनो बच्चो को रक्त मे सना हुआ देख लिया। घबरा गये। सिपहियो ने झटपट नाना को मनू के घोडे पर से उतारा। मनू भी कूद पडी। मोरोपन्त ने उसको चिपटा लिया। उतावले होकर पूछा, 'मनू कहा लगी है बेटी?' 'मुझको तो बिलकुल नही लगी काका', मनू ने जरा मुस्कराकर कहा, 'नाना को अवश्य चोट आई है, परन्तु बहुत नही है।' 'कैसे लगी मनू?' बाजीराव ने प्रश्न किया। कोठी मे प्रवेश करते करते मनू ने उत्तर दिया, उँह साधारण-सी बात थी। घोडे ने ठोकर खाई। वह सँभल नही सके। जा गिरे। घोडा भाग गया। घोड़ा ऐसा भागा, ऐसा भागा कि मुझको तो हँसी आने को हुई।' मोरोपन्त ने मनू के इस अल्हडपन पर ध्यान नही दिया। नाना को मनू अपने घोडे पर ले आई, वे इस बात पर मन ही मन प्रसन्न थे।