भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१८ झांसी की रानी बाजीराव को सुनाते हुये मोरोपन्त ने पूछा, 'तू नाना साहब को कैसे उठा लाई ?' मनू ने उत्तर दिया, 'कैसे भी नही । वह बैठ गये । मै पीछे से सवार हो गई । एक हाथ में लगाम पकड ली, दूसरे से नाना को थाम लिया । बस ।' नाना को मुलायम बिछौनो में लिटा दिया गया । तुरन्त घाव को धोकर मरहम पट्टी कर दी गई । घाव गम्भीर न होने पर भी लम्बा और ज़रा गहरा था । वाजीराव बहुत चिंतित थे । उन्होने रो तक दिया । मोरोपन्त को विश्वास था कि चोट भयप्रद नही है तो भी वह सहानुभूति के कारण वाजीराव के साथ चिन्ताकुल हो रहे थे । जब मनूबाई और मोरोपन्त उसी कोठी के एक भाग मे, जहां उनका निवास था अकेले हुये, मनू ने कहा, 'इतनी जरा सी चोट पर ऐसी घबरा- हट और रोना पीटना ।' 'बेटी, चोट जरा सी नही है । कितना रक्त बह गया है ।' 'आप लोग हमको जो पुराना इतिहास सुनाते है उसमे युद्ध क्या रेशम की डोरो और कपास की पौनियो से हुआ करते थे ?' 'नही मनू । पर यह तो बालक है ।' 'बालक है ! मुझसे वडा है । मलखम्ब और कुश्ती करता है । वाला गुरू उसको शाबाशी देते हैं। अभिमन्यु क्या इससे वडा था ?' 'मनू, श्रव वह समय नही रहा ।' 'क्यो नही रहा काका ? वही आकाश है, वही पृथ्वी । वही सूर्य- चन्द्रमा और नक्षत्र । सब वही है ।' 'तू बहुत हठ करती है ।' 'जब मैं सवाल करती हू तो आप इस प्रकार मेरा मुंह बन्द करने लगते हैं। मैं ऐसे तो नही मानती । मुझको समझाइये, अब क्या हो गया है !' 'श्रव इस देश का भाग्य लौट गया है । अङ्गरेजो के भाग्य का सूर्यो- दय हुआ है । उन लोगो के प्रताप के सामने यहाँ के सब जन निस्तेज हो गये हैं।'