झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १६ 'एक का भाग्य दूसरे ने नही पढ़ा है। यह सब मन-गढ़न्त है। डर- पोको का ढकोसला।' 'तू जब और बड़ी होगी तब संसार का अनुभव तुझको यह सब स्पष्ट कर देगा।' 'मै डरपोक कभी नही हो सकती। आप कहा करते हैं—मनू तू ताराबाई बनना, जीजाबाई और सीता होना। यह सब भुलावा क्यो? अथवा क्या ये सब डरपोक थी?' 'बेटी, ये सब सती और वीर थी, परन्तु समय बदलता रहता है। बदल गया है।' 'यह तो हेरफेर कर वही सब मनमाना तर्क है।' 'फिर कभी बतलाऊँगा।' 'मै ऐसी गलत-सलत बात कभी नही सुनने की।' 'तो सोवेगी या रात भर सवाल करती रहेगी!' अन्त मे खीझ कर, परन्तु मिठास के साथ मोरोपन्त ने कहा। मनू खिलखिलाकर हँस पडी। बोली, 'काका आपने तो टाल दिया। मैं इस प्रसग पर फिर बात करूँगी। अभी अवश्य करवट लेते ही सोई, यह सोई।' फिर एक क्षण उपरांत मनू ने अनुरोध किया, 'काका देख आइये नाना सो गया या नही। आपको नीद आ रही हो तो मै दौड़कर देख आऊँ।' मोरोपन्त ने मनू को नही जाने दिया। स्वयं गये। देख आये। बोले, 'नाना साहब सो गये हैं।' मनू सो गई। मोरोपन्त जागते रहे। उन्होने सोचा, 'मनू की बुद्धि उसकी अवस्था के बहुत आगे निकल चुकी है। अभी तक कोई योग्य वर हाथ नही लगा। दक्षिण जाकर देखना पडेगा।' इसी विचार के लोटफेर में मोरोपन्त का बहुत समय निकल गया। कठिनाई से अन्तिम पहर में नींद आई।