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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई १६ 'एक का भाग्य दूसरे ने नही पढ़ा है। यह सब मन-गढ़न्त है। डर- पोको का ढकोसला।' 'तू जब और बड़ी होगी तब संसार का अनुभव तुझको यह सब स्पष्ट कर देगा।' 'मै डरपोक कभी नही हो सकती। आप कहा करते हैं—मनू तू ताराबाई बनना, जीजाबाई और सीता होना। यह सब भुलावा क्यो? अथवा क्या ये सब डरपोक थी?' 'बेटी, ये सब सती और वीर थी, परन्तु समय बदलता रहता है। बदल गया है।' 'यह तो हेरफेर कर वही सब मनमाना तर्क है।' 'फिर कभी बतलाऊँगा।' 'मै ऐसी गलत-सलत बात कभी नही सुनने की।' 'तो सोवेगी या रात भर सवाल करती रहेगी!' अन्त मे खीझ कर, परन्तु मिठास के साथ मोरोपन्त ने कहा। मनू खिलखिलाकर हँस पडी। बोली, 'काका आपने तो टाल दिया। मैं इस प्रसग पर फिर बात करूँगी। अभी अवश्य करवट लेते ही सोई, यह सोई।' फिर एक क्षण उपरांत मनू ने अनुरोध किया, 'काका देख आइये नाना सो गया या नही। आपको नीद आ रही हो तो मै दौड़कर देख आऊँ।' मोरोपन्त ने मनू को नही जाने दिया। स्वयं गये। देख आये। बोले, 'नाना साहब सो गये हैं।' मनू सो गई। मोरोपन्त जागते रहे। उन्होने सोचा, 'मनू की बुद्धि उसकी अवस्था के बहुत आगे निकल चुकी है। अभी तक कोई योग्य वर हाथ नही लगा। दक्षिण जाकर देखना पडेगा।' इसी विचार के लोटफेर में मोरोपन्त का बहुत समय निकल गया। कठिनाई से अन्तिम पहर में नींद आई।

२० $\qquad$ झांसी की रानी [ २ ] मनूबाई सवेरे नाना को देखने पहुँच गई। वह जग उठा था, पर लेटा हुआ था। मनू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। स्निग्ध स्वर में पूछा, 'नीद कैसी आई ?' 'सोया तो हूँ, पर नीद आई-गई बनी रही। कुछ दर्द है।' नाना ने उत्तर दिया। मनू—'वह दोपहर तक ठीक हो जायगा। तीसरे पहर घूमने चलोगे न ? सध्या से पहले ही लौट आयेंगे।' नाना—'सवारी की धमक से पीडा बढने का डर है।' मनू—'प्रारम्भ में कदाचित थोडी सी पीडा हो, परन्तु शीघ्र उसको दाव लोगे और जब लौटोगे याद नही रहेगा कि कभी चोट लगी थी।' नाना—'यदि पीडा बढ गई तो ?' मनू—'तो सह लेना, फिर कभी गिरोगे तो चोट कम आवेगी।' नाना—'और यदि आज ही फिर फिसल पड़ा तो ?' मनू—'तो मैं तुमको फिर उठा लाऊँगी। चिन्ता मत करो।' नाना—'और जो तुम खुद गिर पडी तो ?' मनू—'तब मै फिर सवार हो जाऊँगी। किसी की सहायता नही लेनी पडेगी और घर आ जाऊँगी।' नाना—'मेरे बस का नही।' मनू—'लड्डू खाओगे ?' नाना—'इच्छा नही।' मनू—'तब क्या इच्छा है ?' नाना—'मुझे चुपचाप पडा रहने दो !' मनू—'कब तक ?' नाना—'तीन चार दिन लग जायेंगे।' मनू—'किसने कहा ?'

लक्ष्मीबाई २१ नाना—'काका कहते थे। वैद्य ने भी कहा था।' मनू—'वैद्य तो लोभवश कहता होगा, पर दादा क्यों कहते थे ?' नाना—'उनसे ही पूछ लेना। मेरा सिर मत खाओ।' मनू हँस पड़ी। फिर दाईं ओर का होठ थोडा सा—बिलकुल जरा सा—दबाकर बोली, 'तुम कहते थे—बाजी प्रभु देशपांडे की कीर्ति से बढ कर कीर्ति कमाऊंगा, तानाजी मालसुरे को पछाडूंगा, स्वर्ग निवासी छत्रपति शिवाजी को अपने कृत्यो से फड़का दू गा, श्रीमन्त पन्तप्रधान प्रथम बाजीराव की बराबरी करूंगा,......' इतने में वहा बाजीराव आ गये। मनू इतनी तीक्ष्णता के साथ बोल रही थी कि बाजीराव ने उसका अन्तिम वाक्य सुन लिया। बोले, 'तेरी चपलता न जाने कब कम होगी ? यह सब क्या बके जा रही है ?' मनू रञ्चमात्र भी नही दबी। बोली, 'इसको दादा आप बकना कहते हैं ? आप ही हम लोगो को यह सब छुटपन से सुनाते आये हैं। मैं उसी को दुहरा रही हूँ। अब इसे आप बकवास समझने लगे हैं ! यह क्यो दादा ?' बाजीराव ने कहा, 'बेटी क्या आज उन बातो के स्मरण से जीवन को चलाने का समय रहा है ? महाभारत की कथायें सुनो और अपने पुरखो की बाते सुनो। अच्छी भली बनो। मन बहलाओ और जीवन को पवित्र सुख से सुखी बनाओ। नाना को चिढ़ाओ मत।' मनू ने मुस्कराकर ओठ जरा सा दबाया, थोडी सी त्योरी संकुचित की और बाजीराव के बिलकुल पास आकर बोली, 'क्या हम लोगो को अब सोकर, खाकर ही जीवन बिताना सिखलाइयेगा दादा ?' बाजीराव को हँसी आई। कुछ कहना ही चाहते थे कि मोरोपन्त कहते हुये आ गये, 'नाना साहब को हाथी पर बिठला कर थोडा सा घूम आने दीजिये। बाहर तैयार खडा है।' बाजीराव ने प्रश्न किया, 'हाथी की सवारी में चोट को धमक तो नही लगेगी ?'

२२ झांसी की रानी मोरोपन्त ने उत्तर दिया, 'नही, पलकिया में बहुत मुलायम गद्दी तकिये लगा दिये गये हैं और हाथी बहुत धीमे चलाया जावेगा।' मनू हाथी को देखने बाहर दौड गई। नाना निस्तार इत्यादि के लिये उठ गया। मनू ने हाथी पहले भी देखे थे, फिर भी वह इस हाथी को बार बार चारो ओर से घूम घूमकर देख रही थी। और उसके डील-डौल पर कभी मुस्करा रही थी, कभी हँस रही थी। थोडी देर बाद बाजीराव नाना को लिये बाहर आये। साथ में छोटा लडका भी था, मोरोपन्त पीछे पीछे। हाथी पर पहले नाना को बिठला दिया गया। फिर छोटे को। महावत ने हाथी को अंकुश छुलाई। हाथी उठा। मनू ने मोरोपन्त से कहा, 'काका मै भी हाथी पर बैठूँगी।' बाजीराव के घुटनो से लिपट कर बोली, 'दादा मैं बैठूँगी।' नाना हौदे में महावत के पास बैठा था। उसने महावत को अविलम्ब चलने का आदेश किया। मनू की ओर देखा भी नही। बाजीराव ने नाना से कहा, 'लिये जाओ न मनू को।' नाना ने मुँह फेर लिया । तब बाजीराव ने दूसरे बालक से कहा, 'रावसाहब मनू को ले लेते तो अच्छा होता।' महावत कुछ ठमका तो नाना ने उसकी पसलियो में उँगली चुभोकर बढने की आज्ञा दी। वह नाना साहब और रावसाहब—दोनो लडको—को लेकर चल दिया। मनू की आँखो में क्षोभ उतर आया। मोरोपन्त का हाथ पकडकर बोली, 'हाथी लौटाओ काका। मै हाथी पर अवश्य बैठूँगी।' बाजीराव कोठी में चले गये। मोरोपन्त को भी क्षोभ हुआ, परन्तु उन्होने उसको नियंत्रित करके कहा, 'वह चला गया बेटी।' मनू मोरोपन्त का हाथ पकड कर खीचने लगी, 'महावत को पुकारिये, वह रुक जायगा। मैं बिना बैठे नही मानूँगी।'

लक्ष्मीबाई २३ मोरोपन्त का क्षोभ भडका। उन्होंने उसका फिर दमन किया। मनू ने फिर हाथी पर बैठने का हठ किया। मोरोपन्त ने क्रुद्ध स्वर में मनू को डाटा, 'तेरे भाग्य मे हाथी नही लिखा है। क्यो व्यर्थ हठ करती है?' मनू तिनक कर सीधी खडी हो गई। तमक कर कुछ कहना चाहती थी। एक क्षण होठ नही खुल सके। मोरोपन्त ने शात करने के प्रयोजन से, भरसक धीमे स्वर में, परन्तु क्रोध के सिलसिले में कहा, 'सैकडो बार कहा कि समय को देखकर चलना चाहिये। हम लोग न तो क्षत्रधारी हैं और न सामत—सरदार। साधारण गृहस्थो की तरह संसार मे रहन-सहन रखना है।.पढी लिखी होने पर भी न जाने सुनती-समझती क्यो नही है। कह दिया कि भाग्य में हाथी नही लिखा है। हठ मत किया कर।' मनू के होठ सिकुडे। चुनौती सी देती हुई बोली, 'मेरे भाग्य मैं एक नहीं दस हाथी लिखे हैं।' मोरोपन्त का क्रोध-क्षोभ भीतर सरक गया। हँस पडे। मनूबाई को पेट से चिपका लिया। कहा, 'अब चल कोई शास्त्र पुराण पढ। तब तक वे दोनो लौट आते हैं।' मनू मचली। बोली, 'मै अपने घोडे पर बैठकर सैर को जाऊगी और उस हाथी को तङ्ग करूगी।' मोरोपन्त सीधे शब्दो में वर्जित करना चाहते थे, परन्तु इस उपकरण में सफलता के चिन्ह न पाकर उन्होने तुरन्त बहाना बनाया, 'घोडे से यदि हाथी चिढ् गया तो तू भले ही बचकर निकल आवे, पर नाना साहब, रावसाहब तथा महावत मारे जावेगे।' वह मान गई। 'तब तक कुछ और करूंगी' मनूबाई ने कहा, 'पुस्तके तो नही पढूगी। बन्दूक से निशानावाज़ी करूंगी।'

२४ झाँसी की रानी [ ३ ] थोडी देर में घण्टा बजाता हुआ हाथी लौट आया । मनू दौड कर बाहर आई । एक क्षण ठहरी और आह खींच कर भीतर चली गई । नाना और राव, दोनो बालक, अपनी जगह चले गये । वाजीराव ने नाना को पुचकार कर पूछा, 'दर्द बढा तो नही ?' 'नही बढा' नाना ने उत्तर दिया, 'अच्छा लग रहा है। मनू कहाँ गई ?' वाजीराव ने कहा, 'भीतर होगी ।' रावसाहब—'उसे बुरा लगा होगा । नाना ने साथ नही लिया, मैने तो कहा था ।' नाना—'वह मुझको सवेरे से ही चिढा रही थी ।' बाजीराव—'क्या ? कैसे ?' नाना—'उसका स्वभाव है ।' कुछ क्षण उपरात मनू वहा आ गई । नाना ने हँसते हुये कहा, 'छवीली, तुम क्या कोई ग्रंथ पढ रही थी ?' मनू जल उठी । बोली, 'मुझमे छवीली मत कहा करो ।' नाना ने और भी हँसकर कहा, 'क्यो नही कहा करू ँ ? यह तो तुम्हारा छुटपन का नाम है ।' मनू की आँख लाल हो गई । बोली, 'मुझको इस नाम से घृणा है ।' नाना गभीर हो गया । बोला, 'मुझको तो यही नाम सुहावना लगता है । छवीली, छवीली ।' 'इस नाम को कभी नही सुनूँगी ।' कहकर मनू वहाँ से जाने को हुई । वाजीराव ने उसको पकड लिया । मनू ने भागना चाहा । न भाग सकी । तब नाना ने भी पकड लिया । 'क्या मनू बुरा मान गई ?' नाना ने स्नेह के साथ पूछा । मनू होठ सिकोडकर, रुखाई के साथ बोली, 'अवश्य । आगे इस नाम से मेरा सम्वोधन कभी मत करना ।'

झाँसी की रानी २५ इसी समय पहरे वाले ने बाजीराव को सूचना दी, 'झाँसी से एक सज्जन आये हैं । नाम तात्या दीक्षित बतलाते हैं ।' नाना बोला, 'मनू एक से दो तात्या हुये ।' मनू का क्षोभ घुला । बाजीराव ने प्रहरी से झासी के आगन्तुक को बिठलाने के लिये कह दिया । मनू ने कहा, 'झासी वाला तात्या कुश्ती लडता होगा ?' रावसाहब—'झाँसी में कोई वाला गुरू होगे तो कुश्ती का भी चलन होगा । वह तो राज्य ठहरा ।' नाना—'बडा राज्य है ?' बाजीराव—'बडा तो नही है, पर खासा है । हमारे पुरखो का ़ प्रदान किया है, जानते होगे ।' रावसाहब—'अपने को फिर नही मिल सकता है ?' मनू—'दान किया हुआ फिर कैसे वापिस होगा ?' बाजीराव—'हां वापिस नही हो सकता । झासी के राजा हमारे सूबेदार थे । इस समय अपना बस होता तो झासी में हम लोगो का काफी मान होता । परन्तु झासी तो बहुत दिनो से अङ्गरेजो की मातहती में है ।' मनू—'ग्वालियर, इन्दोर, बरोदा, नागपुर, सतारा इत्यादि के होते हुये भी थोडे से अङ्गरेज़ो ने आप सब को दाब लिया !' बाजीराव—'यह मानना पडेगा कि वे लोग हमसे ज्यादा चालाक हैं । हथियार उनके पास अधिक अच्छे हैं । शूरवीर भी हैं और भाग्य उनके साथ है और आपसी फूट हमारे साथ · ' मनू—'दादा क्या भाग्य में शूरवीर होना लिखा रहता है ? यदि ऐसा है तो अनेक सिंह स्यार होते होगे और अनेक स्यार सिंह ।' बाजीराव—'जब स्यार पागल हो जाता है तब सिंह भी उससे डरने लगता है ।'

२६ झांसी की रानी

मनू—'वह भाग्य से पागल होता है अथवा और किसी कारण से ?' वाजीराव हँसने लगे । इसी समय मोरोपन्त ने आकर कहा, 'दादा साहब तात्या दीक्षित झासी से आये हैं ।' वाजीराव बोले, 'मैने उनको बिठला लिया है । यही ठहरने, भोजन इत्यादि का प्रबन्ध कर दिया जावे ।' मोरोपन्त ने कहा, 'तात्या मुझको एक बार काशी में मिले थे । यात्रा के लिये गये हुये थे । विद्या विदग्ध हैं, सज्जन हैं । राजा के यहा उनका मान है ।' मनू ने हँसकर पूछा, 'कुश्ती लडते हैं ? तलवार बन्दूक चलाते हैं ? घोडे पर चढते हैं ?' 'दुर पगली', मोरोपन्त ने कहा, 'जो यह सब न जानता हो वह क्या कुछ है ही नही ? दीक्षित जी पक्के ब्राह्मण हैं । शास्त्री, प्राचार्य ।' नाना ने मनू की ओर देखते हुये कहा, 'और यदि ब्राह्मण हथियार बाध उठे तो वह पक्के से कच्चा हो जायगा ? मनू ! तुम बतलाओ ।' मनू हँसी । वाजीराव भी हँसे । मोरोपन्त ने मुस्करा कर कहा, 'इस लडकी जैसी वाचाल तो शायद ही कोई हुई हो ।' मनू ने होठो की समेट में मुस्कराहट को दवा कर गर्दन मोडी, फिर, विशाल नेत्र सकुचित करके बोली, 'आप ही कहा करते हैं, ताराबाई ऐसी थी, जीजाबाई ऐसी थी, अहिल्या ऐसी, मीरा ऐसी । मैं पूछती हू, क्या ये सब मुह पर मुहर लगाये रहती थी ?'

लक्ष्मीबाई २७ [ ४ ] भोजनोपरान्त तात्या दीक्षित से बाजीराव और मोरोपन्त मिले । तात्या दीक्षित ज्योतिष और तन्त्र के शास्त्री थे । काशी, नागपूर, पूना इत्यादि घूमे हुये थे । महाराष्ट्र समाज से काफी परिचित थे । बिठूर ( ब्रह्मावर्त ) में बाजीराव के साथ दक्षिणी ब्राह्मणो का एक बडा परिवार आ बसा था ।* उस काल में मलखंब और मल्लयुद्ध के आचार्य वाला गुरू का अखाडा दक्षिणियो और हिन्दुस्तानियो से भरा रहता था और गुरू बल, यौवन और स्वाभिमान को वितरित सा करते रहते थे । वह स्वय इतने दृढ, बलिष्ठ और स्वाभिमानी थे कि उनको लेटने तक में चित होने से नफरत थी । औंधे लेटा करते थे । मोरोपन्त ने अवसर निकाल कर तात्या दीक्षित से प्रार्थना की, 'दीक्षित जी, मुझे अपनी कन्या मनूबाई के विवाह की बडी चिंता लग रही है । मैने बहुत खोज की है परन्तु कोई योग्य घर नही मिला । अब भी खोज कर रहा हू । आपका ससार में बहुत परिचय है । आप इस कन्या के लिये योग्य वर ढूंढ दीजिये । बडा अनुग्रह होगा ।' बाजीराव ने भी कहा, 'कन्या बहुत सुन्दर है । बडी कुशाग्र बुद्धि और होनहार । उसके लिये अच्छा वर ढूँढना ही चाहिये ।' मोरोपन्त बोले, 'सब हथियार चलाना बहुत अच्छी तरह जानती है । घोडे की सवारी में पुरुषो के कान पकडती है । जब चार वर्ष की थी इसकी माँ का देहान्त हो गया था । इसलिये मैंने स्वय उसकी दिन रात देख भाल की है, लालन पालन किया है । मराठी, सस्कृत और हिन्दी पढाई है । शास्त्रो में उसकी रुचि है ।' *इनकी सख्या लगभग आठ सहस्त्र थी । बाजीराव की पेंशन का एक बडा भाग लोगो पर खर्च होता था ।

२८ झाँसी की रानी वाजीराव ने कहा, 'वालिका है, इसलिये इस आयु में जितना पढ सकती थी उतना ही पढा है परन्तु तेज बहुत है। पूजा पाठ मन लगा कर करती है।' पूजापाठ सम्बन्धी रुचि पर वाजीराव ने ज्यादा जोर दिया। अश्वा- रोहण इत्यादि पर बहुत कम। तात्या दीक्षित ने जन्मपत्री मागी। मोरोपन्त ने ला दी। दीक्षित ने उसकी परीक्षा करके कहा, 'ऐसी जन्मपत्री मैने कदाचित् ही पहले कभी देखी हो। इसको कही की रानी होना चाहिये।' मोरोपन्त फूल गये । वाजीराव को भी सन्तोष हुआ। वोले, 'जव आप जावें साथ में जन्मपत्री लेते जावे। योग्य वर से मेल खाने पर हमको सूचित करें।' दीक्षित ने स्वीकार किया। उसी समय रावसाहब के साथ वहाँ मनू आगई। वाजीराव ने दीक्षित से कहा, 'यही वह कन्या है।' दीक्षित ने मनूवाई के विशाल नेत्र, भोरे को लजाने वाले चमकीले वाल, स्वर्णासा रंग और सम्पूर्ण चेहरे का अतीव सुन्दर वनाव देखकर प्रसन्नता प्रकट की। दीक्षित ने ममता प्रदर्शित करते हुये कहा, 'आ वेटी आ ! तूने शास्त्र पढे हैं ? उच्च कुल की ब्राह्मण कन्या के लिए यह उपयुक्त ही है।' मनू और रावसाहब वाजीराव के पास मसनद पर वैठ गये। मनू विना किसी सकोच के वोली, 'मैने शास्त्र आँखों से देख भर लिये हैं। मुझको तुलसीदास की रामायण वडी प्रिय लगती है परन्तु तलवार चलाना, मलखंव भाजना घोडे की सवारी, ये उससे भी वढकर भाते हैं...।' वाजीराव ने हँस कर टोका, 'और वात वनाना, चवड़-चवड करना इन सव से बढ़ कर अच्छा लगता है।'

लक्ष्मीबाई २६ मोरोपन्त के मन में क्षणिक रोष आया। वह चाहते थे कि लडकी तात्या दीक्षित के सामने ऐसी बर्ते कि शील-संकोच का अवतार जान पडे। 'परन्तु', दीक्षित ने हँसकर कहा, 'बालिका है। अभी ससार का उसने देखा ही क्या है।' 'बिलकुल अबोध हैं', मोरोपन्त बोले, 'सयानी होने पर अपने घर-द्वार का खूब प्रबन्ध करेगी।' तात्या दीक्षित ने उत्साहित होकर भविष्यवाणी सी की, 'यह किसी राज्य की रानी होगी।' रावसाहब अभी तक मनू के पीछे चुप बैंठा था। बोला, 'राज्य तो सब अङ्गरेज़ो ने ले लिये हैं। नये राज्य कहाँ से बनेगे ?' 'राज्यो की और राज्य बनाने वालो की न कमी रही है और न रहेगी।' तात्या दीक्षित ने हँसकर कहा। मनूबाई मुस्कराकर बोली, 'पर कुछ लोग तो कहते हैं कि अङ्गरेजो ने ऐसा ज़ोर बाँध लिया है कि कोई सिर ही नही उठा सकता।' बाजीराव विषयान्तर करना चाहते थे। बोले, 'झाँसी में बाग-बगीचे कितने हैं?' तात्या दीक्षित—'बहुत हैं। राजा के बगीचे हैं। सरदारो और सेठ-साहूकारो के हैं। नगर के भीतर ही अनेक हैं।' मनू—'सेना बडी है ?' दीक्षित—'खासी है।' मनू—'घोडे अच्छे हे ?' रावसाहब—'हाथी ?' दीक्षित—'बहुत से हैं।' मनू—'कितने ?' इतने में वहाँ सुगठित शरीर का एक युवक आया।

३० झाँसी की रानी वाजीराव ने पूछा, 'क्या है तात्या ?' अपने नाम के एक और मनुष्य को सम्बोधित होते देखकर दीक्षित चौंका । मनू ने बेधडक कहा, 'यह हमारे गुरू के अखाडे के प्रधान हैं। आपके नामवारी ।' तात्या दीक्षित ने मन में चाहा कि लडकी और अधिक बात न करे । युवक तात्या ने पेशवा से विनय की, 'महाराज, गुरूजी ने कहलवाया हे कि झाँसी से जो आचार्य आये हैं वे हमारे अखाडे को देखने की कृपा करे ।' दीक्षित ने हामी भरी । तीसरे पहर सब लोग बाला गुरू के अखाडे पर गये । मलखम्ब और मल्लयुद्ध का प्रदर्शन हुआ ।

लक्ष्मीबाई ३१ [ ५ ] महाराष्ट्र में सतारा के निकट बाई नाम का एक गाव है। पेशवा के राज्य काल में वहा के कृष्णराव ताम्बे को एक ऊँचा पद प्राप्त था। कृष्णराव ताम्बे का पुत्र बलवन्तराव पराक्रमी था। उसको पेशवा की सेना में उच्चपद मिला। बलवन्तराव के दो लड़के हुये—एक मोरोपन्त और दूसरा सदाशिव। ये दोनो पूना दरबार के कृपापात्र मे थे। उस समय पेशवा बाजीराव द्वितीय पूना में रहते थे। सन् १८१८ में अङ्गरेजो ने पेशवाई खत्म करके बाजीराव को आठ लाख रुपया वार्षिक पेन्शन और बिठूर की जागीर दी। बाजीराव ब्रह्मावर्त (बिठूर) चले आये। बाजीराव के निज भाई चिमाजी आपा साहव थे। वे बनारस चले गये। मोरोपन्त ताम्बे पर चिमाजी की बडी कृपा थी। मोरोपन्त चिमाजी के साथ पूना से काशी चले आये और उनका काम काज करते रहे। इसके उपलक्ष में मोरोपन्त को पचास रुपया मासिक वेतन मिलता था। यही मोरोपन्त मनूबाई के पिता थे। मोरोपन्त की पत्नी का नाम भागीरथीबाई था। सुशील, चतुर, रूपवती। मनूबाई कार्तिक बदी १४ स० १८६१ (१६ नवम्बर सन् १८३५) के दिन काशी में इन्ही से उत्पन्न हुई थी। चिमाजी का शरीरात हो गया। मोरोपन्त को अपने कुटुम्ब के पालन के लिए कोई सहारा काशी मे नही दिखलाई पड रहा था। बाजीराव ने काशी से बिठूर बुला लिया। मोरोपन्त पर बाजीराव की भी बहुत कृपा रही। मनूबाई चार वर्ष की ही थी जब उसकी माता—भागीरथीबाई— का देहान्त हो गया। मनू के पालन-पोषण और लाड़दुलार का सम्पूर्ण भार.

३२ झाँसी की रानी मोरोपन्त पर आ पड़ा । मोरोपन्त ने मनू को बहुत प्यार के साथ पाला । लडके से बढकर । मनू इतनी सुन्दर थी कि छुटपन में बाजीराव इत्यादि उसको स्नेहवश 'छबीली' के नाम से पुकारते थे । बाजीराव के अपनी कोई सन्तान न थी । इसलिये उन्होने नाना धोधूपन्त नाम के एक बालक को गोद लिया । नाना तीन भाई थे— नाना, बाला और रावसाहब । बाला उस समय बिठूर में न था । छोटा सहोदर रावसाहब था । मनू और ये दोनो लडके साथ खेलते-खाते और पढते थे । मलखंब कुश्ती, तलवार-बन्दूक का चलाना, अश्वारोहण, पढना-लिखना इत्यादि सब इन तीनो ने छुटपन से साथ साथ सीखा । मनू चपल, हठीली और बहुत पैनी बुद्धि की थी । कम आयु की होने पर भी वह इन हुनरो में उन दोनो बालको से बहुत आगे निकल गई । स्त्रियो की संगति कम प्राप्त होने के कारण वह लाज संकोच की अतीत दबन और झिझक से दूर हटती गई थी । नाना आठ लाख वार्षिक पेंशन अपने और अपने भाइयो की परम्परा के -जीवन सुख के लिये काफी से अधिक समझता होगा । बाजीराव को पैंशन 'उसको और उसके कुटुम्ब के लिए दी गई थी ।' बिना किसी प्रयत्न-प्रयास के आठ लाख वार्षिक मिलते जावे तो फिर किस महत्त्वाकांक्षा की जोखिम के लिये और अधिक हाथ-पैर हिलाये जावें ? मनूबाई ऐसा नही सोचती थी । छत्रपति शिवाजी इत्यादि के आधु- निक और अर्जुन-भीम इत्यादि के पुरातन आख्यानो ने मनू की कल्पना को एक अस्पष्ट और अदम्य गुदगुदी दे रक्खी थी ।

लक्ष्मीबाई ३३

[ ६ ]

तात्या दीक्षित आदर और भेट सहित बिठूर से झाँसी लौट आये । उन्हे मालूम था कि मनूबाई के लिये जितना अच्छा वर ढूँढ कर दूंगा । उतना ही अधिक बाजीराव सतुष्ट होगे । और उस सतोष का फल उनकी जेब के लिये उतना ही महत्वपूर्ण होगा । दीक्षित ने मन में कई वर टटोले । जिसको स्थिर करते उसी के लिये प्रश्न उठता । 'क्या पेशवा इसको पसन्द कर लेंगे ?' जो उचट जाता । सरदार श्रेणी के ब्राह्मणो में कुछ की टीपनाये लाकर मिलाई, पर मेल न खाया । सोचा, 'श्रीमन्त सरकार गगाधरराव की जन्मपत्री मिलाकर देखूं शायद टक्कर खा जाय ।' टीपना प्राप्त हो गई । मिल गई । परन्तु एक असमजस हुआ, गङ्गाधरराव की पहली पत्नी का देहान्त काफी दिन पहले हो चुका था । वह विधुर थे । विवाह करना चाहते थे । परन्तु अपने कठोर स्वभाव के कारण बहुत बदनाम थे । भाँड-भगतियो, सखियो इत्यादि के हंसी-मजाक, आमोद-प्रमोद में उनका काफी समय जाता था । नाटकशाला में तो रात का अधिकांश प्राय बीतता ही था । इसलिये जितना वह करते थे, उससे कही अधिक की, उनकी बदनामी फैल गई थी । नाटकशाला मे बहुत रुचि रखने के कारण खास तौर पर वेश्याओ, गायिकाओ और नर्तकियो के नाटकशाला में नौकर रखते हुये भी स्त्रियो की भूमिका में अभिनय करने की वजह से उनकी झूठी बदनामी बहुत करदी गई थी । इस पर, फिर उनका कठोर बर्ताव । दीक्षित सोचते थे कि विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो जाऊँ तो सदा याद किया जाऊँगा । मोरोपन्त तो हमेशा कृतज्ञ रहेगे ही, बाजीराव भी मानते रहेगे, झाँसी राज्य में कितना सम्मान होगा ? मनूबाई ? सुन्दर है, रानी बनने योग्य सब गुण उसमे हैं । चपल चंचल और उद्धत है । मुँहजोर है । किसी और घर में जायगी तो न खुद सुखी हो

३४ झाँसी की रानी सकेगी और न अपने पति को सुखी बना सकेगी । गंगाधरराव की रानी बनने पर चपलता न रह सकेगी । जीवन में सयम आ जावेगा । वह १३-१४ साल की है और गंगाधरराव चालीस से कुछ ऊपर । परन्तु उनका स्वास्थ्य अच्छा है । स्वभाव कठोर सही है, लेकिन ऐसी उग्र स्त्री के लिये तो ऐसा ही पति चाहिये । घोडे की सवारी, तीर-तमचा, मल्लखभ और क्या क्या यह सब झासी के राज्य ही में मिल सकेगा, और कही असम्भव है । यह सब सोचकर दीक्षित ने झाँसी के राजा के साथ मनूबाई का विवाह सम्बन्ध कराने में किसी प्रकार की भी कसर न लगाने का निश्चय किया । गङ्गाधरराव के पास गये । एकांत पाकर बोले, 'महाराज से निवेदन करने करने आया हू । राजा ने कहा, कहिये दीक्षित जी ।' दीक्षित - 'रनवास को सूना हुये काफी समय हो गया है । अब...' राजा—'मै क्या करूँ ? जन्मपत्री मे मेरे इतने तेजस्वी ग्रह हैं कि मेल ही नही खाती । एकाध जगह मिली तो लडकी का भुखमरा पिता चाहता था कि मै सब कामधाम छोड कर, बाप-बेटी की पूजा-अर्चा में ही बाकी का जीवन बिताऊँ । इससे तो मेरी नाटकशाला ही अच्छी । अप्सराओ के सुन्दर अभिनय । सुखलाल के बनाये नये-नये पर्दे । सुरीला-गायन वादन और सुहावना नृत्य । आपने तो अनेक बार रंग- शाला में अभिनय देखे हैं । दीक्षित—'श्रीमन्त सरकार, बन्श परम्परा बनाये रखने के लिये शास्त्रो का विधान अनिवार्य है । प्रजा अपने राजा की बगल में अपना राजकुमार देखने की लालसा रखती है । सरकार का आमोद-प्रमोद भी चलता रह सकता है ।' 'हाँ ठीक है ।' कह कर गङ्गाधरराव सोचने लगे । कुछ क्षण बाद बोले, 'दीक्षित जी आप तो काव्यरसिक हैं । श्री हर्षदेव रचित रत्नावली नाटिका कितनी कोमल, मधुर, मन्जु कल्पना है, और मोतीबाई अब भी कितनी सुन्दर, कितना मनोहर अभिनय करती है ।'

लक्ष्मीबाई ३५ दीक्षित ने सोचा अब खतरे में पडे। मोतीबाई के प्रति राजा का ऐसा उत्साह देखकर दीक्षित कुण्ठित हुये। धीरज पकड कर दीक्षित कह गये, 'परन्तु सरकार, महल सूना है। उसमें तो दिवाली कोई सजातीय कन्या ही जगमगा सकती है।' गङ्गाधरराव की आँख बडी थी और डोरे लाल। दीक्षित ने डरते डरते देखा। डोरे और कुछ रक्तिम हो गये। राजा ने कहा, 'मैं क्या करूँ? सजातीय की कन्या को ज़बरदस्ती पकड लूँ?' दीक्षित ने तुरन्त उत्तर दिया, 'नही महाराज, मैने जन्मपत्रियो की परीक्षा करली है, बिलकुल मिल गई हैं। कन्या भी देख आया हूँ। बहुत सुन्दर और कुशाग्र बुद्धि है। उसमें रानी होने योग्य समस्त गुण हैं।' 'कहाँ पर?' राजा ने जरा मुस्कराकर पूछा। दीक्षित का साहस बढा। उत्तर दिया, 'महाराज, वह इस समय बिठूर में है। श्रीमन्त पन्त प्रधान पेशवा का काम-काज देखने पर उसका पिता मोरोपन्त ताम्बे नियुक्त है। पढी लिखी है और समयोचित सभी गुण उसमे हैं।' राजा ने प्रश्न किया, 'ताम्बे कुलीन होते हैं, यह मै जानता हूँ लेकिन मोरोपन्त भट्ट भिक्षुक तो नही है?' दीक्षित ने जवाब दिया, 'श्रीमन्त पेशवा की यज्ञशाला पर एक रामभट्ट गोडसे है। वह मोरोपन्त का मित्र है। उसने मोरोपन्त की पुत्री को विद्याभ्यास भर कराया है। इसके सिवाय मोरोपन्त का रामभट्ट या किसी भट्ट से और कोई सम्बन्ध नही है।' गङ्गाधरराव ने जरा तीखेपन से कहा, 'मै पूछता हूँ मोरोपन्त भिक्षुक है या नही?' दीक्षित ने दृढता के साथ उत्तर दिया, 'कदापि नही, सरकार।' गङ्गाधरराव ने दूसरा प्रश्न किया, 'पेशवा और मोरोपन्त में कैसा सम्बन्ध है?'

३६ झाँसी की रानी दीक्षित—'बहुत घनिष्ठ। मित्रो जैसा। कोई नही कह सकता कि पेशवा मालिक हैं और मोरोपन्त नौकर। कन्या को पेशवा ने बिलकुल अपनी पुत्री की तरह मान रक्खा है। मै स्वयं देख आया हू।' राजा—'वे लोग सम्बन्ध को स्वीकार कर रहे हैं?' दीक्षित—'कर लेंगे। मुझको विश्वास है।' राजा—'तब सगाई मगनी इत्यादि के लिये आपको ही बिठूर जाना पड़ेगा।' हर्ष के मारे दीक्षित का दिमाग चक्कर खा गया। बोले, 'अवश्य जाऊँगा, सरकार।' फिर गला भर आया। आँख मे एक आँसू। 'यह क्या दीक्षित जी?' राजा ने मिठास के साथ कहा। दीक्षित गला सयत करके बोले, 'झांसी की जनता को यह समाचार बहुत हर्ष देगा, श्रीमन्त।'

लक्ष्मीबाई ३७ [ ७ ] राज्य के अन्य कर्मचारियो के साथ तात्या दीक्षित बिठूर गये। मोरोपन्त और बाजीराव को सम्वाद सुनाया। उन्होने स्वीकार कर लिया। गङ्गाधरराव की आयु का कोई लिहाज नही किया गया। मनूबाई का शृंगार कराया गया। रंगीन रेशमी साड़ी, स्वर्ण के आभूषण, मानिक मोती के हार। बाजीराव ने अपने वे सब आभरण मनूबाई से फिर वापिस नही लिये। मनूबाई के बडे बडे गोल नेत्र मणि मुक्ताओ को भी आभा दे रहे थे। दुर्गा सी जान पड़ती थी। सगाई वाग्दान की रीति होने के बाद मनूबाई नाना साहब और रावसाहब एक ही कमरे में इकट्ठे हुये। वे दोनो लड़के भी रेशमी-वस्त्रो और आभूषणो से लदे थे। सगाई का उत्सव बाजीराव ने धूम-धाम से करवाया। बालको में बातचीत होने लगी। नाना—'अब तो मनू तू झाँसी से हाथियो पर बैठकर ब्रह्मावर्त आया करेगी।' मनू—'एक हाथी पर या दस पर?' नाना—'एक पर बैठेगी, बाकी पर मंत्री, सेनापति इत्यादि बैठे आवेगे।' मनू—'मुझको तो घोडे की सवारी पसन्द है।' नाना—'झाँसी में बैठ पावेगी?' मनू—'कौन रोक लेगा?' नाना—'सुनता हू राजा बडा क्रोधी है।' मनू—'तो क्या मुझे सूली मिलेगी?' रावसाहब—'अरे नही। पर नवकर झुककर चलना पडेगा।' मनू ने नवकर झुककर कमरे का एक चक्कर काटा। हँस कर बोली, 'ऐसे? ऐसे चलना पड़ेगा?'

३८ झांसी की रानी वे दोनो लडके भी हँस दिये । मनू की कान्ति से वह घर झिलमिला उठा । और जब वे बालक हँसे, उनके दातो की दीप्ति से वह घर दमक उठा । रावसाहब—'मनू तुम्हारे चले जाने पर हम लोगो को सब तरफ सूना सूना लगेगा ।' मनू—'तो साथ चले चलना ।' नाना—'काका एकाध महीने के लिये जाने दे सकते हैं अधिक समय के लिये नही ।' मनू—'अधिक समय तो यही रहना चाहिये ! बाला गुरू से तुमको अभी बहुत सीखना है। आया ही क्या है ? मलखम्भ, कुश्ती इत्यादि से शरीर को खूब कमाओ। अच्छी तरह से हथियार चलाना सीखो....' नाना—'और फिर दिल्ली पर धावा बोल दो ।' मनू—'दिल्ली मे क्या रक्खा है ! दादा, काका और अखाडे के सब समझदार लोग चर्चा करते हैं कि दिल्ली के कटघरे में अब एक कठपुतली भर रह गई है ।' नाना—'अब तो सब तरफ अंगरेज़ो का चरचराटा है ।' मनू हँस पडी । रावसाहव ने कहा, 'तो क्या अङ्गरेज़ हमको वैसे ही निगल जायेंगे ?' मनू हँसते हँसते बोली, 'नाना साहव को कदाचित् विश्वास नही होता कि अङ्गरेज़ भी हराये जा सकते हैं ।' नाना जरा कुढ गया । कहने लगा, 'छबीली को सिवाय घमंड मारने के और कुछ आता ही नही ।' उन उज्वल विशाल नेत्रो को और भी विस्तार मिला । मनू बोली, 'फिर छबीली कहा ?' नाना हँस पडा । 'आज तो तुमने अपने ही मुँह से छबीली कह दिया ! ओह मात खाई !' नाना ने कहा । मनू भी हँसी । बोली, 'आगे कभी मत कहना ।'