झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ झाँसी की रानी [ ३ ] थोडी देर में घण्टा बजाता हुआ हाथी लौट आया । मनू दौड कर बाहर आई । एक क्षण ठहरी और आह खींच कर भीतर चली गई । नाना और राव, दोनो बालक, अपनी जगह चले गये । वाजीराव ने नाना को पुचकार कर पूछा, 'दर्द बढा तो नही ?' 'नही बढा' नाना ने उत्तर दिया, 'अच्छा लग रहा है। मनू कहाँ गई ?' वाजीराव ने कहा, 'भीतर होगी ।' रावसाहब—'उसे बुरा लगा होगा । नाना ने साथ नही लिया, मैने तो कहा था ।' नाना—'वह मुझको सवेरे से ही चिढा रही थी ।' बाजीराव—'क्या ? कैसे ?' नाना—'उसका स्वभाव है ।' कुछ क्षण उपरात मनू वहा आ गई । नाना ने हँसते हुये कहा, 'छवीली, तुम क्या कोई ग्रंथ पढ रही थी ?' मनू जल उठी । बोली, 'मुझमे छवीली मत कहा करो ।' नाना ने और भी हँसकर कहा, 'क्यो नही कहा करू ँ ? यह तो तुम्हारा छुटपन का नाम है ।' मनू की आँख लाल हो गई । बोली, 'मुझको इस नाम से घृणा है ।' नाना गभीर हो गया । बोला, 'मुझको तो यही नाम सुहावना लगता है । छवीली, छवीली ।' 'इस नाम को कभी नही सुनूँगी ।' कहकर मनू वहाँ से जाने को हुई । वाजीराव ने उसको पकड लिया । मनू ने भागना चाहा । न भाग सकी । तब नाना ने भी पकड लिया । 'क्या मनू बुरा मान गई ?' नाना ने स्नेह के साथ पूछा । मनू होठ सिकोडकर, रुखाई के साथ बोली, 'अवश्य । आगे इस नाम से मेरा सम्वोधन कभी मत करना ।'