झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंझाँसी की रानी २५ इसी समय पहरे वाले ने बाजीराव को सूचना दी, 'झाँसी से एक सज्जन आये हैं । नाम तात्या दीक्षित बतलाते हैं ।' नाना बोला, 'मनू एक से दो तात्या हुये ।' मनू का क्षोभ घुला । बाजीराव ने प्रहरी से झासी के आगन्तुक को बिठलाने के लिये कह दिया । मनू ने कहा, 'झासी वाला तात्या कुश्ती लडता होगा ?' रावसाहब—'झाँसी में कोई वाला गुरू होगे तो कुश्ती का भी चलन होगा । वह तो राज्य ठहरा ।' नाना—'बडा राज्य है ?' बाजीराव—'बडा तो नही है, पर खासा है । हमारे पुरखो का ़ प्रदान किया है, जानते होगे ।' रावसाहब—'अपने को फिर नही मिल सकता है ?' मनू—'दान किया हुआ फिर कैसे वापिस होगा ?' बाजीराव—'हां वापिस नही हो सकता । झासी के राजा हमारे सूबेदार थे । इस समय अपना बस होता तो झासी में हम लोगो का काफी मान होता । परन्तु झासी तो बहुत दिनो से अङ्गरेजो की मातहती में है ।' मनू—'ग्वालियर, इन्दोर, बरोदा, नागपुर, सतारा इत्यादि के होते हुये भी थोडे से अङ्गरेज़ो ने आप सब को दाब लिया !' बाजीराव—'यह मानना पडेगा कि वे लोग हमसे ज्यादा चालाक हैं । हथियार उनके पास अधिक अच्छे हैं । शूरवीर भी हैं और भाग्य उनके साथ है और आपसी फूट हमारे साथ · ' मनू—'दादा क्या भाग्य में शूरवीर होना लिखा रहता है ? यदि ऐसा है तो अनेक सिंह स्यार होते होगे और अनेक स्यार सिंह ।' बाजीराव—'जब स्यार पागल हो जाता है तब सिंह भी उससे डरने लगता है ।'