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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२६ झांसी की रानी

मनू—'वह भाग्य से पागल होता है अथवा और किसी कारण से ?' वाजीराव हँसने लगे । इसी समय मोरोपन्त ने आकर कहा, 'दादा साहब तात्या दीक्षित झासी से आये हैं ।' वाजीराव बोले, 'मैने उनको बिठला लिया है । यही ठहरने, भोजन इत्यादि का प्रबन्ध कर दिया जावे ।' मोरोपन्त ने कहा, 'तात्या मुझको एक बार काशी में मिले थे । यात्रा के लिये गये हुये थे । विद्या विदग्ध हैं, सज्जन हैं । राजा के यहा उनका मान है ।' मनू ने हँसकर पूछा, 'कुश्ती लडते हैं ? तलवार बन्दूक चलाते हैं ? घोडे पर चढते हैं ?' 'दुर पगली', मोरोपन्त ने कहा, 'जो यह सब न जानता हो वह क्या कुछ है ही नही ? दीक्षित जी पक्के ब्राह्मण हैं । शास्त्री, प्राचार्य ।' नाना ने मनू की ओर देखते हुये कहा, 'और यदि ब्राह्मण हथियार बाध उठे तो वह पक्के से कच्चा हो जायगा ? मनू ! तुम बतलाओ ।' मनू हँसी । वाजीराव भी हँसे । मोरोपन्त ने मुस्करा कर कहा, 'इस लडकी जैसी वाचाल तो शायद ही कोई हुई हो ।' मनू ने होठो की समेट में मुस्कराहट को दवा कर गर्दन मोडी, फिर, विशाल नेत्र सकुचित करके बोली, 'आप ही कहा करते हैं, ताराबाई ऐसी थी, जीजाबाई ऐसी थी, अहिल्या ऐसी, मीरा ऐसी । मैं पूछती हू, क्या ये सब मुह पर मुहर लगाये रहती थी ?'

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