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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २७ [ ४ ] भोजनोपरान्त तात्या दीक्षित से बाजीराव और मोरोपन्त मिले । तात्या दीक्षित ज्योतिष और तन्त्र के शास्त्री थे । काशी, नागपूर, पूना इत्यादि घूमे हुये थे । महाराष्ट्र समाज से काफी परिचित थे । बिठूर ( ब्रह्मावर्त ) में बाजीराव के साथ दक्षिणी ब्राह्मणो का एक बडा परिवार आ बसा था ।* उस काल में मलखंब और मल्लयुद्ध के आचार्य वाला गुरू का अखाडा दक्षिणियो और हिन्दुस्तानियो से भरा रहता था और गुरू बल, यौवन और स्वाभिमान को वितरित सा करते रहते थे । वह स्वय इतने दृढ, बलिष्ठ और स्वाभिमानी थे कि उनको लेटने तक में चित होने से नफरत थी । औंधे लेटा करते थे । मोरोपन्त ने अवसर निकाल कर तात्या दीक्षित से प्रार्थना की, 'दीक्षित जी, मुझे अपनी कन्या मनूबाई के विवाह की बडी चिंता लग रही है । मैने बहुत खोज की है परन्तु कोई योग्य घर नही मिला । अब भी खोज कर रहा हू । आपका ससार में बहुत परिचय है । आप इस कन्या के लिये योग्य वर ढूंढ दीजिये । बडा अनुग्रह होगा ।' बाजीराव ने भी कहा, 'कन्या बहुत सुन्दर है । बडी कुशाग्र बुद्धि और होनहार । उसके लिये अच्छा वर ढूँढना ही चाहिये ।' मोरोपन्त बोले, 'सब हथियार चलाना बहुत अच्छी तरह जानती है । घोडे की सवारी में पुरुषो के कान पकडती है । जब चार वर्ष की थी इसकी माँ का देहान्त हो गया था । इसलिये मैंने स्वय उसकी दिन रात देख भाल की है, लालन पालन किया है । मराठी, सस्कृत और हिन्दी पढाई है । शास्त्रो में उसकी रुचि है ।' *इनकी सख्या लगभग आठ सहस्त्र थी । बाजीराव की पेंशन का एक बडा भाग लोगो पर खर्च होता था ।