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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२८ झाँसी की रानी वाजीराव ने कहा, 'वालिका है, इसलिये इस आयु में जितना पढ सकती थी उतना ही पढा है परन्तु तेज बहुत है। पूजा पाठ मन लगा कर करती है।' पूजापाठ सम्बन्धी रुचि पर वाजीराव ने ज्यादा जोर दिया। अश्वा- रोहण इत्यादि पर बहुत कम। तात्या दीक्षित ने जन्मपत्री मागी। मोरोपन्त ने ला दी। दीक्षित ने उसकी परीक्षा करके कहा, 'ऐसी जन्मपत्री मैने कदाचित् ही पहले कभी देखी हो। इसको कही की रानी होना चाहिये।' मोरोपन्त फूल गये । वाजीराव को भी सन्तोष हुआ। वोले, 'जव आप जावें साथ में जन्मपत्री लेते जावे। योग्य वर से मेल खाने पर हमको सूचित करें।' दीक्षित ने स्वीकार किया। उसी समय रावसाहब के साथ वहाँ मनू आगई। वाजीराव ने दीक्षित से कहा, 'यही वह कन्या है।' दीक्षित ने मनूवाई के विशाल नेत्र, भोरे को लजाने वाले चमकीले वाल, स्वर्णासा रंग और सम्पूर्ण चेहरे का अतीव सुन्दर वनाव देखकर प्रसन्नता प्रकट की। दीक्षित ने ममता प्रदर्शित करते हुये कहा, 'आ वेटी आ ! तूने शास्त्र पढे हैं ? उच्च कुल की ब्राह्मण कन्या के लिए यह उपयुक्त ही है।' मनू और रावसाहब वाजीराव के पास मसनद पर वैठ गये। मनू विना किसी सकोच के वोली, 'मैने शास्त्र आँखों से देख भर लिये हैं। मुझको तुलसीदास की रामायण वडी प्रिय लगती है परन्तु तलवार चलाना, मलखंव भाजना घोडे की सवारी, ये उससे भी वढकर भाते हैं...।' वाजीराव ने हँस कर टोका, 'और वात वनाना, चवड़-चवड करना इन सव से बढ़ कर अच्छा लगता है।'