भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

लक्ष्मीबाई २३ मोरोपन्त का क्षोभ भडका। उन्होंने उसका फिर दमन किया। मनू ने फिर हाथी पर बैठने का हठ किया। मोरोपन्त ने क्रुद्ध स्वर में मनू को डाटा, 'तेरे भाग्य मे हाथी नही लिखा है। क्यो व्यर्थ हठ करती है?' मनू तिनक कर सीधी खडी हो गई। तमक कर कुछ कहना चाहती थी। एक क्षण होठ नही खुल सके। मोरोपन्त ने शात करने के प्रयोजन से, भरसक धीमे स्वर में, परन्तु क्रोध के सिलसिले में कहा, 'सैकडो बार कहा कि समय को देखकर चलना चाहिये। हम लोग न तो क्षत्रधारी हैं और न सामत—सरदार। साधारण गृहस्थो की तरह संसार मे रहन-सहन रखना है।.पढी लिखी होने पर भी न जाने सुनती-समझती क्यो नही है। कह दिया कि भाग्य में हाथी नही लिखा है। हठ मत किया कर।' मनू के होठ सिकुडे। चुनौती सी देती हुई बोली, 'मेरे भाग्य मैं एक नहीं दस हाथी लिखे हैं।' मोरोपन्त का क्रोध-क्षोभ भीतर सरक गया। हँस पडे। मनूबाई को पेट से चिपका लिया। कहा, 'अब चल कोई शास्त्र पुराण पढ। तब तक वे दोनो लौट आते हैं।' मनू मचली। बोली, 'मै अपने घोडे पर बैठकर सैर को जाऊगी और उस हाथी को तङ्ग करूगी।' मोरोपन्त सीधे शब्दो में वर्जित करना चाहते थे, परन्तु इस उपकरण में सफलता के चिन्ह न पाकर उन्होने तुरन्त बहाना बनाया, 'घोडे से यदि हाथी चिढ् गया तो तू भले ही बचकर निकल आवे, पर नाना साहब, रावसाहब तथा महावत मारे जावेगे।' वह मान गई। 'तब तक कुछ और करूंगी' मनूबाई ने कहा, 'पुस्तके तो नही पढूगी। बन्दूक से निशानावाज़ी करूंगी।'