झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ झांसी की रानी मोरोपन्त ने उत्तर दिया, 'नही, पलकिया में बहुत मुलायम गद्दी तकिये लगा दिये गये हैं और हाथी बहुत धीमे चलाया जावेगा।' मनू हाथी को देखने बाहर दौड गई। नाना निस्तार इत्यादि के लिये उठ गया। मनू ने हाथी पहले भी देखे थे, फिर भी वह इस हाथी को बार बार चारो ओर से घूम घूमकर देख रही थी। और उसके डील-डौल पर कभी मुस्करा रही थी, कभी हँस रही थी। थोडी देर बाद बाजीराव नाना को लिये बाहर आये। साथ में छोटा लडका भी था, मोरोपन्त पीछे पीछे। हाथी पर पहले नाना को बिठला दिया गया। फिर छोटे को। महावत ने हाथी को अंकुश छुलाई। हाथी उठा। मनू ने मोरोपन्त से कहा, 'काका मै भी हाथी पर बैठूँगी।' बाजीराव के घुटनो से लिपट कर बोली, 'दादा मैं बैठूँगी।' नाना हौदे में महावत के पास बैठा था। उसने महावत को अविलम्ब चलने का आदेश किया। मनू की ओर देखा भी नही। बाजीराव ने नाना से कहा, 'लिये जाओ न मनू को।' नाना ने मुँह फेर लिया । तब बाजीराव ने दूसरे बालक से कहा, 'रावसाहब मनू को ले लेते तो अच्छा होता।' महावत कुछ ठमका तो नाना ने उसकी पसलियो में उँगली चुभोकर बढने की आज्ञा दी। वह नाना साहब और रावसाहब—दोनो लडको—को लेकर चल दिया। मनू की आँखो में क्षोभ उतर आया। मोरोपन्त का हाथ पकडकर बोली, 'हाथी लौटाओ काका। मै हाथी पर अवश्य बैठूँगी।' बाजीराव कोठी में चले गये। मोरोपन्त को भी क्षोभ हुआ, परन्तु उन्होने उसको नियंत्रित करके कहा, 'वह चला गया बेटी।' मनू मोरोपन्त का हाथ पकड कर खीचने लगी, 'महावत को पुकारिये, वह रुक जायगा। मैं बिना बैठे नही मानूँगी।'