झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २१ नाना—'काका कहते थे। वैद्य ने भी कहा था।' मनू—'वैद्य तो लोभवश कहता होगा, पर दादा क्यों कहते थे ?' नाना—'उनसे ही पूछ लेना। मेरा सिर मत खाओ।' मनू हँस पड़ी। फिर दाईं ओर का होठ थोडा सा—बिलकुल जरा सा—दबाकर बोली, 'तुम कहते थे—बाजी प्रभु देशपांडे की कीर्ति से बढ कर कीर्ति कमाऊंगा, तानाजी मालसुरे को पछाडूंगा, स्वर्ग निवासी छत्रपति शिवाजी को अपने कृत्यो से फड़का दू गा, श्रीमन्त पन्तप्रधान प्रथम बाजीराव की बराबरी करूंगा,......' इतने में वहा बाजीराव आ गये। मनू इतनी तीक्ष्णता के साथ बोल रही थी कि बाजीराव ने उसका अन्तिम वाक्य सुन लिया। बोले, 'तेरी चपलता न जाने कब कम होगी ? यह सब क्या बके जा रही है ?' मनू रञ्चमात्र भी नही दबी। बोली, 'इसको दादा आप बकना कहते हैं ? आप ही हम लोगो को यह सब छुटपन से सुनाते आये हैं। मैं उसी को दुहरा रही हूँ। अब इसे आप बकवास समझने लगे हैं ! यह क्यो दादा ?' बाजीराव ने कहा, 'बेटी क्या आज उन बातो के स्मरण से जीवन को चलाने का समय रहा है ? महाभारत की कथायें सुनो और अपने पुरखो की बाते सुनो। अच्छी भली बनो। मन बहलाओ और जीवन को पवित्र सुख से सुखी बनाओ। नाना को चिढ़ाओ मत।' मनू ने मुस्कराकर ओठ जरा सा दबाया, थोडी सी त्योरी संकुचित की और बाजीराव के बिलकुल पास आकर बोली, 'क्या हम लोगो को अब सोकर, खाकर ही जीवन बिताना सिखलाइयेगा दादा ?' बाजीराव को हँसी आई। कुछ कहना ही चाहते थे कि मोरोपन्त कहते हुये आ गये, 'नाना साहब को हाथी पर बिठला कर थोडा सा घूम आने दीजिये। बाहर तैयार खडा है।' बाजीराव ने प्रश्न किया, 'हाथी की सवारी में चोट को धमक तो नही लगेगी ?'