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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३१ [ ५ ] महाराष्ट्र में सतारा के निकट बाई नाम का एक गाव है। पेशवा के राज्य काल में वहा के कृष्णराव ताम्बे को एक ऊँचा पद प्राप्त था। कृष्णराव ताम्बे का पुत्र बलवन्तराव पराक्रमी था। उसको पेशवा की सेना में उच्चपद मिला। बलवन्तराव के दो लड़के हुये—एक मोरोपन्त और दूसरा सदाशिव। ये दोनो पूना दरबार के कृपापात्र मे थे। उस समय पेशवा बाजीराव द्वितीय पूना में रहते थे। सन् १८१८ में अङ्गरेजो ने पेशवाई खत्म करके बाजीराव को आठ लाख रुपया वार्षिक पेन्शन और बिठूर की जागीर दी। बाजीराव ब्रह्मावर्त (बिठूर) चले आये। बाजीराव के निज भाई चिमाजी आपा साहव थे। वे बनारस चले गये। मोरोपन्त ताम्बे पर चिमाजी की बडी कृपा थी। मोरोपन्त चिमाजी के साथ पूना से काशी चले आये और उनका काम काज करते रहे। इसके उपलक्ष में मोरोपन्त को पचास रुपया मासिक वेतन मिलता था। यही मोरोपन्त मनूबाई के पिता थे। मोरोपन्त की पत्नी का नाम भागीरथीबाई था। सुशील, चतुर, रूपवती। मनूबाई कार्तिक बदी १४ स० १८६१ (१६ नवम्बर सन् १८३५) के दिन काशी में इन्ही से उत्पन्न हुई थी। चिमाजी का शरीरात हो गया। मोरोपन्त को अपने कुटुम्ब के पालन के लिए कोई सहारा काशी मे नही दिखलाई पड रहा था। बाजीराव ने काशी से बिठूर बुला लिया। मोरोपन्त पर बाजीराव की भी बहुत कृपा रही। मनूबाई चार वर्ष की ही थी जब उसकी माता—भागीरथीबाई— का देहान्त हो गया। मनू के पालन-पोषण और लाड़दुलार का सम्पूर्ण भार.