भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

३२ झाँसी की रानी मोरोपन्त पर आ पड़ा । मोरोपन्त ने मनू को बहुत प्यार के साथ पाला । लडके से बढकर । मनू इतनी सुन्दर थी कि छुटपन में बाजीराव इत्यादि उसको स्नेहवश 'छबीली' के नाम से पुकारते थे । बाजीराव के अपनी कोई सन्तान न थी । इसलिये उन्होने नाना धोधूपन्त नाम के एक बालक को गोद लिया । नाना तीन भाई थे— नाना, बाला और रावसाहब । बाला उस समय बिठूर में न था । छोटा सहोदर रावसाहब था । मनू और ये दोनो लडके साथ खेलते-खाते और पढते थे । मलखंब कुश्ती, तलवार-बन्दूक का चलाना, अश्वारोहण, पढना-लिखना इत्यादि सब इन तीनो ने छुटपन से साथ साथ सीखा । मनू चपल, हठीली और बहुत पैनी बुद्धि की थी । कम आयु की होने पर भी वह इन हुनरो में उन दोनो बालको से बहुत आगे निकल गई । स्त्रियो की संगति कम प्राप्त होने के कारण वह लाज संकोच की अतीत दबन और झिझक से दूर हटती गई थी । नाना आठ लाख वार्षिक पेंशन अपने और अपने भाइयो की परम्परा के -जीवन सुख के लिये काफी से अधिक समझता होगा । बाजीराव को पैंशन 'उसको और उसके कुटुम्ब के लिए दी गई थी ।' बिना किसी प्रयत्न-प्रयास के आठ लाख वार्षिक मिलते जावे तो फिर किस महत्त्वाकांक्षा की जोखिम के लिये और अधिक हाथ-पैर हिलाये जावें ? मनूबाई ऐसा नही सोचती थी । छत्रपति शिवाजी इत्यादि के आधु- निक और अर्जुन-भीम इत्यादि के पुरातन आख्यानो ने मनू की कल्पना को एक अस्पष्ट और अदम्य गुदगुदी दे रक्खी थी ।