झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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तात्या दीक्षित आदर और भेट सहित बिठूर से झाँसी लौट आये । उन्हे मालूम था कि मनूबाई के लिये जितना अच्छा वर ढूँढ कर दूंगा । उतना ही अधिक बाजीराव सतुष्ट होगे । और उस सतोष का फल उनकी जेब के लिये उतना ही महत्वपूर्ण होगा । दीक्षित ने मन में कई वर टटोले । जिसको स्थिर करते उसी के लिये प्रश्न उठता । 'क्या पेशवा इसको पसन्द कर लेंगे ?' जो उचट जाता । सरदार श्रेणी के ब्राह्मणो में कुछ की टीपनाये लाकर मिलाई, पर मेल न खाया । सोचा, 'श्रीमन्त सरकार गगाधरराव की जन्मपत्री मिलाकर देखूं शायद टक्कर खा जाय ।' टीपना प्राप्त हो गई । मिल गई । परन्तु एक असमजस हुआ, गङ्गाधरराव की पहली पत्नी का देहान्त काफी दिन पहले हो चुका था । वह विधुर थे । विवाह करना चाहते थे । परन्तु अपने कठोर स्वभाव के कारण बहुत बदनाम थे । भाँड-भगतियो, सखियो इत्यादि के हंसी-मजाक, आमोद-प्रमोद में उनका काफी समय जाता था । नाटकशाला में तो रात का अधिकांश प्राय बीतता ही था । इसलिये जितना वह करते थे, उससे कही अधिक की, उनकी बदनामी फैल गई थी । नाटकशाला मे बहुत रुचि रखने के कारण खास तौर पर वेश्याओ, गायिकाओ और नर्तकियो के नाटकशाला में नौकर रखते हुये भी स्त्रियो की भूमिका में अभिनय करने की वजह से उनकी झूठी बदनामी बहुत करदी गई थी । इस पर, फिर उनका कठोर बर्ताव । दीक्षित सोचते थे कि विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो जाऊँ तो सदा याद किया जाऊँगा । मोरोपन्त तो हमेशा कृतज्ञ रहेगे ही, बाजीराव भी मानते रहेगे, झाँसी राज्य में कितना सम्मान होगा ? मनूबाई ? सुन्दर है, रानी बनने योग्य सब गुण उसमे हैं । चपल चंचल और उद्धत है । मुँहजोर है । किसी और घर में जायगी तो न खुद सुखी हो