झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ झाँसी की रानी सकेगी और न अपने पति को सुखी बना सकेगी । गंगाधरराव की रानी बनने पर चपलता न रह सकेगी । जीवन में सयम आ जावेगा । वह १३-१४ साल की है और गंगाधरराव चालीस से कुछ ऊपर । परन्तु उनका स्वास्थ्य अच्छा है । स्वभाव कठोर सही है, लेकिन ऐसी उग्र स्त्री के लिये तो ऐसा ही पति चाहिये । घोडे की सवारी, तीर-तमचा, मल्लखभ और क्या क्या यह सब झासी के राज्य ही में मिल सकेगा, और कही असम्भव है । यह सब सोचकर दीक्षित ने झाँसी के राजा के साथ मनूबाई का विवाह सम्बन्ध कराने में किसी प्रकार की भी कसर न लगाने का निश्चय किया । गङ्गाधरराव के पास गये । एकांत पाकर बोले, 'महाराज से निवेदन करने करने आया हू । राजा ने कहा, कहिये दीक्षित जी ।' दीक्षित - 'रनवास को सूना हुये काफी समय हो गया है । अब...' राजा—'मै क्या करूँ ? जन्मपत्री मे मेरे इतने तेजस्वी ग्रह हैं कि मेल ही नही खाती । एकाध जगह मिली तो लडकी का भुखमरा पिता चाहता था कि मै सब कामधाम छोड कर, बाप-बेटी की पूजा-अर्चा में ही बाकी का जीवन बिताऊँ । इससे तो मेरी नाटकशाला ही अच्छी । अप्सराओ के सुन्दर अभिनय । सुखलाल के बनाये नये-नये पर्दे । सुरीला-गायन वादन और सुहावना नृत्य । आपने तो अनेक बार रंग- शाला में अभिनय देखे हैं । दीक्षित—'श्रीमन्त सरकार, बन्श परम्परा बनाये रखने के लिये शास्त्रो का विधान अनिवार्य है । प्रजा अपने राजा की बगल में अपना राजकुमार देखने की लालसा रखती है । सरकार का आमोद-प्रमोद भी चलता रह सकता है ।' 'हाँ ठीक है ।' कह कर गङ्गाधरराव सोचने लगे । कुछ क्षण बाद बोले, 'दीक्षित जी आप तो काव्यरसिक हैं । श्री हर्षदेव रचित रत्नावली नाटिका कितनी कोमल, मधुर, मन्जु कल्पना है, और मोतीबाई अब भी कितनी सुन्दर, कितना मनोहर अभिनय करती है ।'