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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 526 में से

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लक्ष्मीबाई ३५ दीक्षित ने सोचा अब खतरे में पडे। मोतीबाई के प्रति राजा का ऐसा उत्साह देखकर दीक्षित कुण्ठित हुये। धीरज पकड कर दीक्षित कह गये, 'परन्तु सरकार, महल सूना है। उसमें तो दिवाली कोई सजातीय कन्या ही जगमगा सकती है।' गङ्गाधरराव की आँख बडी थी और डोरे लाल। दीक्षित ने डरते डरते देखा। डोरे और कुछ रक्तिम हो गये। राजा ने कहा, 'मैं क्या करूँ? सजातीय की कन्या को ज़बरदस्ती पकड लूँ?' दीक्षित ने तुरन्त उत्तर दिया, 'नही महाराज, मैने जन्मपत्रियो की परीक्षा करली है, बिलकुल मिल गई हैं। कन्या भी देख आया हूँ। बहुत सुन्दर और कुशाग्र बुद्धि है। उसमें रानी होने योग्य समस्त गुण हैं।' 'कहाँ पर?' राजा ने जरा मुस्कराकर पूछा। दीक्षित का साहस बढा। उत्तर दिया, 'महाराज, वह इस समय बिठूर में है। श्रीमन्त पन्त प्रधान पेशवा का काम-काज देखने पर उसका पिता मोरोपन्त ताम्बे नियुक्त है। पढी लिखी है और समयोचित सभी गुण उसमे हैं।' राजा ने प्रश्न किया, 'ताम्बे कुलीन होते हैं, यह मै जानता हूँ लेकिन मोरोपन्त भट्ट भिक्षुक तो नही है?' दीक्षित ने जवाब दिया, 'श्रीमन्त पेशवा की यज्ञशाला पर एक रामभट्ट गोडसे है। वह मोरोपन्त का मित्र है। उसने मोरोपन्त की पुत्री को विद्याभ्यास भर कराया है। इसके सिवाय मोरोपन्त का रामभट्ट या किसी भट्ट से और कोई सम्बन्ध नही है।' गङ्गाधरराव ने जरा तीखेपन से कहा, 'मै पूछता हूँ मोरोपन्त भिक्षुक है या नही?' दीक्षित ने दृढता के साथ उत्तर दिया, 'कदापि नही, सरकार।' गङ्गाधरराव ने दूसरा प्रश्न किया, 'पेशवा और मोरोपन्त में कैसा सम्बन्ध है?'

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