झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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३६ झाँसी की रानी दीक्षित—'बहुत घनिष्ठ। मित्रो जैसा। कोई नही कह सकता कि पेशवा मालिक हैं और मोरोपन्त नौकर। कन्या को पेशवा ने बिलकुल अपनी पुत्री की तरह मान रक्खा है। मै स्वयं देख आया हू।' राजा—'वे लोग सम्बन्ध को स्वीकार कर रहे हैं?' दीक्षित—'कर लेंगे। मुझको विश्वास है।' राजा—'तब सगाई मगनी इत्यादि के लिये आपको ही बिठूर जाना पड़ेगा।' हर्ष के मारे दीक्षित का दिमाग चक्कर खा गया। बोले, 'अवश्य जाऊँगा, सरकार।' फिर गला भर आया। आँख मे एक आँसू। 'यह क्या दीक्षित जी?' राजा ने मिठास के साथ कहा। दीक्षित गला सयत करके बोले, 'झांसी की जनता को यह समाचार बहुत हर्ष देगा, श्रीमन्त।'