भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३८ झांसी की रानी वे दोनो लडके भी हँस दिये । मनू की कान्ति से वह घर झिलमिला उठा । और जब वे बालक हँसे, उनके दातो की दीप्ति से वह घर दमक उठा । रावसाहब—'मनू तुम्हारे चले जाने पर हम लोगो को सब तरफ सूना सूना लगेगा ।' मनू—'तो साथ चले चलना ।' नाना—'काका एकाध महीने के लिये जाने दे सकते हैं अधिक समय के लिये नही ।' मनू—'अधिक समय तो यही रहना चाहिये ! बाला गुरू से तुमको अभी बहुत सीखना है। आया ही क्या है ? मलखम्भ, कुश्ती इत्यादि से शरीर को खूब कमाओ। अच्छी तरह से हथियार चलाना सीखो....' नाना—'और फिर दिल्ली पर धावा बोल दो ।' मनू—'दिल्ली मे क्या रक्खा है ! दादा, काका और अखाडे के सब समझदार लोग चर्चा करते हैं कि दिल्ली के कटघरे में अब एक कठपुतली भर रह गई है ।' नाना—'अब तो सब तरफ अंगरेज़ो का चरचराटा है ।' मनू हँस पडी । रावसाहव ने कहा, 'तो क्या अङ्गरेज़ हमको वैसे ही निगल जायेंगे ?' मनू हँसते हँसते बोली, 'नाना साहव को कदाचित् विश्वास नही होता कि अङ्गरेज़ भी हराये जा सकते हैं ।' नाना जरा कुढ गया । कहने लगा, 'छबीली को सिवाय घमंड मारने के और कुछ आता ही नही ।' उन उज्वल विशाल नेत्रो को और भी विस्तार मिला । मनू बोली, 'फिर छबीली कहा ?' नाना हँस पडा । 'आज तो तुमने अपने ही मुँह से छबीली कह दिया ! ओह मात खाई !' नाना ने कहा । मनू भी हँसी । बोली, 'आगे कभी मत कहना ।'