झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३६ नाना ने गंभीर मुख मुद्रा कर के कहा, 'अब तो झांसी की रानी कहा करूंगा।' मनू मुसकराई। उस मुस्कान में झांसी का कितना महान और कैसा अमर इतिहास छिपा पड़ा था। उसी समय वहा बाजीराव और मोरोपन्त आ गये। बाजीराव प्रसन्न थे और मोरोपन्त आनन्द विभोर। उन बच्चो को सुखी देखकर वे लोग उस कमरे के वातावरण में समा गये। बाजीराव के मुँह से निकल पडा, 'मनू तू ऐसी भाग्यवती हो कि भाग्यो को बाटती रहे।' मोरोपन्त ने मनू को चिढाने के तात्पर्य से कहा, 'श्रीमन्त ने इसका छुटपन में क्या नाम रक्खा था ? मै तो भूल ही गया।' मनू ने गर्दन मोडकर ओठ सिकोडे। आखो में क्रोध लाने की चेष्ठा की। 'ऊँ' निकला और मुस्करा दी। बाजीराव बोले, 'क्या नाम था मनू ? तू ही बदलादे बेटी।' बाजीराव के पेट पर अपना सिर रखकर मनू ने कहा, 'नही दादा। छवीली नाम अच्छा नही लगता।' खिलखिला कर हँस पडे। उसी समय तात्या ने आकर कहा, सरकार ! लोग इकट्ठे हो गये हैं। बातचीत होनी है।' वे तीनो चले गये। बैठक में ब्रह्मावर्त निवासी महाराष्ट्र के प्रमुख ब्राह्मण विवाह की शर्तों की चर्चा कर रहे थे। मोरोपन्त के पास सोना चादी नही था, पर जो कुछ था वह उसे विवाह में लगा देने को तैयार थे। बिठूर के इन प्रतिष्ठित ब्राह्मणो की मध्यस्थता मे तै हुआ कि विवाह का व्यय झासी के राजा वहन करेंगे और विवाह झासी में होकर होगा। यह भी तै हुआ कि मोरोपन्त झासी में ही स्थायी तौर पर रहा करेगे और उनकी गणना झासी के सरदारो में होगी।