झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २२१ शान के साथ अपना अभिषेक करवा लिये । राजगद्दिया भी तोडी-मरोडी, परन्तु शासक की हैसियत से उनका इस देश मे रहना केवल छावनी का प्रवास मात्र रहा । असल में, जनता को रुष्ट, असन्तुष्ट और क्षुब्ध करके यहाँ तो क्या ससार के किसी कोने में कोई भी राज्य नही कर सकता । फिर इस देश की जनता व्यक्तित्व-मग्न और महासस्कृतिमयी है । बहुत दिनो तक कदापि विदेशी शासन को सहन नही कर सकती । इसीलिये उसकी अन्तरात्मा आसानी के साथ, उस समय के स्त्री-पुरुष नेताओ की बात सुन रही थी और मनमें गाठो पर गाठें बाघती चली जाती थी, कि कब अवसर मिले और सिर के बोझ को उतार कर फेक दे ।* 'गार्डन और स्कीन इत्यादि अगरेज सोचते थे कि यहा के लोग दब्बू है—जनता एक भेडियाधसान है, थोडा वेतन पाने वाले बहुसख्यक हिन्दुस्थानी मोटी रकमें समेटने वाले अल्पसख्यक अगरेजो को सदा अपना सहयोग देते रहेगे । अगरेजो का सब स्वार्थ-कार्य शास्त्रीय और वैज्ञानिक ढंग पर चल रहा था । केवल चल नही रहा था किसी ढँग पर भी तो वह था मानव प्रकृति का, भारतीय जान-प्रकृति का, अध्ययन और विश्लेषण । रेल तार जारी हो गये । नहरे खुदी, तालाब सुधारे गये । डाकुओ और बटमारो का दमन हुआ । किसान सुभीते से अपनी खेती काटने लगे । व्योपारी अपना रोजगार करने लगे । मन्दिरो, मसजिदो में लोग अपने विश्वास के अनुसार श्रद्धा भेट कर उठे । कुछ पाठशालाये और मदरसे भी खुल गये । सडके बनी । उन पर पेड लगे । पञ्चायते टूटी । अदालते खुली । कानून का बर्ताव हुआ परन्तु अगरेजो ने यह न समझा, कि हिन्दू मुसलमान मन ही मन मना रहे हैं, कि हमारा खोया हुआ अधिकार फिर कब और कैसे हमारे हाथ में आवेगा ।
- परिशिष्ट में सर जान मालकम का वक्तव्य देखिये ।