भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

२२० झाँसी की रानी [ ४३ ] मऊ छावनी से लेकर मेरठ छावनी तक और मेरठ छावनी से लेकर दमदम बारकपूर की छावनियो तक, विविध प्रकार के लक्षण दिखलाई पडने लगे । मऊ मेरठ, बारकपूर इत्यादि छावनियो में साधू और फकीर, विविध प्रकार के वेष और रूपक धारण करके, क्रांति का कार्य करने लगे । ग्वालियर की छावनी में नारायण शास्त्री उस मिहतराणी को गाना गवाते ले गया । सिपाही उसके नाचने-गाने पर रीझे । समाप्ति पर पैसे देने लगे । नर्तकी ने पूछा, 'आप लोग सेंधिया सरकार के नौकर हैं या अङ्गरेज के ?' 'अङ्गरेज के ।' 'अङ्गरेजो का निमक खाने वालो का पैसा नही छूती ।' और वह इठला कर चली गई । उन लोगो ने नारायण से कहा, 'यह कौन है ? बडी घमंडिन मालूम होती है ।' नारायण—'है तो वैरागिन, परन्तु झांसी की बाईसाहब के राज्य की लडकी है ।' 'उनका राज्य तो चला गया ।' 'अङ्गरेजो ने बेईमानी से ले लिया फिर लौटेगा ।' छावनियो के सिपाही समय पर चुपचाप परेड पर जाते । चुपचाप ड्यूटी करते, परन्तु भन्नाये हुये । अङ्गरेजो को ऊपर की तह चिकनी और समतल दिख रही थी । नीचे के कोलाहल का उनको पता न था । हिन्दुस्थान एक सपने में उनकी चुटकी में आया, सपने में ही चुटकी में बना रहेगा और यह सपना कभी न टूटेगा । वे लोग इस बात को नही जानते थे, उन्होने कभी इस बात को नही जाना, कि हिन्दुस्थान जीता भले ही आसानी के साथ जावे लेकिन बहुत समय तक इसको मुट्ठी में रखे रहना असम्भव है । बाहर से आये हुये शासको को इस देश को पराजित करने में बहुत समय नही लगा ।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास) · पृष्ठ 231, कुल 526 में से · BharatKosha