झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २१६ तात्या —'एक दिन था जब अङ्गरेजो के प्रतिनिधि अपने मस्तक को वादशाह के पैर रखने की जगह बतलाते थे ।* अब हमारे सबके सिर पायदान बनते जा रहे हैं। कलाकारो की कला, कारीगरो का शिल्प और अनेक लोगो की रोटी गई । अब धर्म ईमान की बारी आई है । देश और जनता की रक्षा का समय आ गया है ।' रानी—'मेरी समझ में अभी थोडा काम और करने की आवश्यकता है ।' रघुनाथसिंह--'आपकी जो आज्ञा हो । वैसे हम लोग बुन्देलखण्ड से ही प्रारम्भ करने को तैयार हैं ।' रानी—'अभी नही । ओर्छा, अजयगढ और छत्रपुर के राजा बालक हैं । इन राज्यो के प्रबन्ध पर अङ्गरेजो की छाप है । इसके सिवाय क्रान्ति का लग्गा लगवाते ही डाकू और बटमार बढ जावेंगे । हमारी जनता ही इन उपद्रवो से पीडित होगी । जब तक हमारे पास मजबूत सेना नही हो गई है, तब तक हम लोगो को प्रारम्भ नही करना चाहिये । अङ्गरेजो को परास्त करने के साथ साथ इन जन-पीडिको का भी तो दमन करना पडेगा, अन्यथा जनता का क्षोभ अङ्गरेजो के सिर से टलकर हम लोगो के सिर आवेगा । हिन्दुस्थानी सैनिको को अपनाने का क्रम जारी रखना चाहिये । जब मन भर जावे, तब हा कही जावेगी ।' रानी की इस सम्मति से लोग सहमत हुये । *सन् १६१२ में जान रसल का भेजा हुआ पत्र । परिशिष्ठ देखिये ।