भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

लक्ष्मीबाई २१६ तात्या —'एक दिन था जब अङ्गरेजो के प्रतिनिधि अपने मस्तक को वादशाह के पैर रखने की जगह बतलाते थे ।* अब हमारे सबके सिर पायदान बनते जा रहे हैं। कलाकारो की कला, कारीगरो का शिल्प और अनेक लोगो की रोटी गई । अब धर्म ईमान की बारी आई है । देश और जनता की रक्षा का समय आ गया है ।' रानी—'मेरी समझ में अभी थोडा काम और करने की आवश्यकता है ।' रघुनाथसिंह--'आपकी जो आज्ञा हो । वैसे हम लोग बुन्देलखण्ड से ही प्रारम्भ करने को तैयार हैं ।' रानी—'अभी नही । ओर्छा, अजयगढ और छत्रपुर के राजा बालक हैं । इन राज्यो के प्रबन्ध पर अङ्गरेजो की छाप है । इसके सिवाय क्रान्ति का लग्गा लगवाते ही डाकू और बटमार बढ जावेंगे । हमारी जनता ही इन उपद्रवो से पीडित होगी । जब तक हमारे पास मजबूत सेना नही हो गई है, तब तक हम लोगो को प्रारम्भ नही करना चाहिये । अङ्गरेजो को परास्त करने के साथ साथ इन जन-पीडिको का भी तो दमन करना पडेगा, अन्यथा जनता का क्षोभ अङ्गरेजो के सिर से टलकर हम लोगो के सिर आवेगा । हिन्दुस्थानी सैनिको को अपनाने का क्रम जारी रखना चाहिये । जब मन भर जावे, तब हा कही जावेगी ।' रानी की इस सम्मति से लोग सहमत हुये । *सन् १६१२ में जान रसल का भेजा हुआ पत्र । परिशिष्ठ देखिये ।