भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२१८ झाँसी की रानी शुभ मुहूर्त में दामोदरराव का जनेऊ हो गया । लोगो ने खुशी खुशी नजर-भेंट की । काफी रुपया जमा हुआ । दावत-पङ्गत हुई । गायन-वादन और दुर्गा का नृत्य । इसके बाद चुने हुये लोगों की बैठक । रानी लक्ष्मीबाई सफेद साडी पहने एक जरा ऊँचे आसन पर बैठी । आसपास उनकी खास सहेलिया । जरा फासले पर नाना साहब और उनके भाई, तात्या टोपे, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, खुदाबख्श इत्यादि । रानी ने कहा, 'जिस सफलता के साथ आप लोगो के सहयोग से यह छोटा सा यज्ञ हुआ, उसी सफलता के साथ उस बडे यज्ञ की पूर्ति होनी चाहिये ।' नाना बोला, 'अच्छे कारीगरो और बढिया सामान का प्रबन्ध हो गया हैं । यज्ञ की सामग्री ढोने वाले पशुओ और अश्वमेघ के घोडो का भी इन्तजाम कर लिया गया है ।' तात्या—'मैं जरा सीधी भाषा में बात करना चाहता हूँ ।' रानी—'कर सकते हो, सब अपने ही अपने हैं । बाहर स्त्रियो का कठोर पहरा है । काम की बात करके अधिवेशन को समाप्त कर दिया जावेगा । तात्या—'उत्तरी और पूर्वी हिन्दुस्थान में अथक काम हो रहा है । अङ्गरेजो ने जिन कार्तूसो को अरम्भ मे जारी किया था, प्रतिवाद को देखकर लगभग बन्द कर दिया है । परन्तु उनके कारण जो घृणा उत्पन्न हुई थी, वह बिलकुल कम नही हुई है । अब अङ्गरेज हिन्दू सिपाहियो को तिलक टीका लगाये हुये परेड में नही आने देते, इस कारण हिन्दू सिपाहियो में घोर खिन्नता फैल गई है ।' खुदाबख्श—'यहा की फौज के मुसलमान सिपाहियो में भी बहुत जोश है । उनके दीन को बरबाद करने का जो काम चर्बी वाले कारतूसो ने जारी किया था, वह ऐसा नही है, कि कतई तौर पर बन्द हो गया हो ।'