झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २१७ रानी को इस अपमान पर जितना क्षोभ हुआ उसकी मात्रा का माप उस मानसिक बल से लग सकता है, जिसकी सहायता से रानी ने उस क्षोभ को दबाया। अपने ही रुपये के लिये ऐसे चार भले आदमियों की जमानत जिनमें मेरा मन भरे !' अङ्गरेजों के, केन्द्रीकरण के, गार्डन के अहंकार की हद हो गई । झाँसी की प्रमुख जनता कुछ इसी तरह सोच रही थी । झाँसी में चार क्या बावन बड़े बड़े आदमी थे। रानी की जमानत देने के लिये सब तैयार हो गये। कुछ ने तो खुदाबख्श और दीवान रघुनाथसिंह से यहां तक कहा, 'अर्ज़ी देने की क्या अटक पड़ी थी ? इतना रुपया तो हमी लोग नजर कर सकते हैं ।' परन्तु रानी को अपने रुपये के लिये हठ था। उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। जो 'भले आदमी' जमानत देने के लिये गार्डन के सामने हाजिर हुये, वे थे— लाला बीमा वाले, मगन गन्धी, मोती खत्री और श्याम चौधरी। गार्डन उनको हतोत्साहित करना चाहता था । बोला, 'सोच-समझकर काम करना। बालिग होने से तीन बरस के भीतर तक दामोदरराव दावा कर सकेगा ।' उन लोगों ने विश्वास दिलाया कि यदि ज़रूरत हो तो हम लोग नकद जमानत दाखिल कर दें । गार्डन को झेप मालूम हुई, इसलिये उन लोगों की साधारण जमानत पर उसने रानी को एक लाख रुपया दे दिया । नियुक्त समय पर समारोह हुआ । दूर दूर के लोग इकट्ठे हुये । झाँसी की जनता की ही बहुत बड़ी संख्या थी। नवाब अलीबहादुर भी शरीक हुये ।