भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 227

२१६ झाँसी की रानी दामोदरराव छ वर्ष का हो चुका था । सातवी लग गई । इस वर्ष में जनेऊ होना ही चाहिये । योजना भी इस स्थिति में आगई थी कि इस वर्ष मे एक महान सम्मेलन का किया जाना जरूरी था । मोतीबाई इत्यादि ने समाचार दिया कि अङ्गरेजो की हिन्दुस्थानी सेना में, काफी असन्तोष फैल गया है । रानी ने पुरोहित को बुलाकर मुहूर्त सुधवाया । मुहूर्त निकलने पर गार्डन को अर्जी दी कि दामोदरराव के नाम से जो छ लाख रुपया खजाने में जमा है, उसमे से उसके जनेऊ के लिये एक लाख रुपया दे दिया जावे ।' पहले तो गार्डन की इच्छा अर्जी को तुरन्त खारिज कर देने की हुई । फिर सोचा हिन्दुओ की यह कोई जरूरी रस्म है, इसलिये अन्तिम निर्णय को स्थगित कर दिया । उसने लोगो से पूछ ताँछ शुरू कर दी । अलीबहादुर से खोजा । उन्होने कहा, 'ब्राह्मणो में यह रस्म लाज़मी है ।' सेठ साहूकारो से पूछा । उन्होने कहा, 'अनिवार्य है ।' अन्त में फैसले को अपने पेशकार की सम्मति पर छोडा । पूछने पर पेशकार ने कहा, 'हुजूर ऊँची जाति के हिन्दुओ में, विशेष- कर ब्राह्मणो में यह रस्म किसी प्रकार भी नही टाली जा सकती ।' गाडन ने कमिश्नर से, कमिश्नर ने लेफ्टिनेट गवर्नर से पूछा । अन्त में गार्डन की मर्जी पर इस शर्त के साथ छोडा गया कि अगर झासी शहर के चार भले आदमी जमानत दे तो रुपया दे दिया जाय । गार्डन ने रानी को सूचना दी, 'खजाने में जो रुपया जमा है वह दामोदरराव नाबालिग का है। यदि बालिग होने पर दामोदरराव ने सरकार पर दावा कर दिया तो सरकार को रुपया अपनी थैली में से देना पडेगा, इसलिये झासी शहर के ऐसे चार आदमियो की जमानत दीजिये, जिनमें मेरा मन भरे ।'

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास) · पृष्ठ 227, कुल 526 में से · BharatKosha