झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• लक्ष्मीबाई २१५ उनकी यह भीषण प्रतिज्ञा उनकी सहेलियो को मालूम थी । वे सब इस प्रतिज्ञा पर प्रसन्न थी—उनको पसन्द न था कि ऐसे सुन्दर बालो का कुसमय क्षय हो । दामोदरराव रानी के प्रगाढ स्नेह में पल रहा था, बढ रहा था । कोई निज माता अपने गर्भ-प्रसून को इतना प्यार न करती होगी जितना वह दामोदरराव को चाहती थी । समय अपनी प्राकृतिक गति से चला जा रहा था । इसी में रानी की योजना भी संवृद्धि और पुष्ट होती जा रही थी । कहा क्या हो रहा है, इसके समाचार उनको निरन्तर मिलते रहते थे । वह युद्ध सामग्री तैयार करने वाले कारीगरो को एकत्र करने की योजना पर, बहुत जोर देती थी—और यह हो रहा था । इस ओर रानी के जासूस और विश्वसनीय सहायक काम कर रहे थे । उस ओर नाना और राव के तथा बहादुरशाह और अवध के साथ सहानुभूति रखने वालो के लोग, अपने अपने काम में जुटे हुये थे । बिहार, बगाल में भी स्वाधीनता की आग सुलग रही थी । महाराष्ट्र, मध्यदेश, बुन्देलखण्ड उत्तर हिन्द तो मानो उसके पलने ही थे । यहा तो स्त्रिया भी काम कर रही थी । रानी ने देखा कि लोगो को इकट्ठा करने का समय आ गया है । वह जानती थी कि ऐन मौके पर तुरन्त इकट्ठा करना दुष्कर होगा, इसलिये वे सबको एक बार एकत्र करके तब योजना को आगे बढाना चाहती थी । हर काम की एक योजना वे पहले बना लेती थी, तब व्यवस्था के साथ उसको व्यवहार का रूप देती थी । इसलिये उन्होने दामोदरराव का जनेऊ करना निश्चित किया और उसके समारोह में जगह जगह से प्रमुख लोगो का, जमाव करके, आगे के कदम की बावत परामर्श करना तै किया । इस काम के लिये एक लाख रुपये की जरूरत थी नकद रुपया उनकी गाठ में न था ।