भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

• लक्ष्मीबाई २१५ उनकी यह भीषण प्रतिज्ञा उनकी सहेलियो को मालूम थी । वे सब इस प्रतिज्ञा पर प्रसन्न थी—उनको पसन्द न था कि ऐसे सुन्दर बालो का कुसमय क्षय हो । दामोदरराव रानी के प्रगाढ स्नेह में पल रहा था, बढ रहा था । कोई निज माता अपने गर्भ-प्रसून को इतना प्यार न करती होगी जितना वह दामोदरराव को चाहती थी । समय अपनी प्राकृतिक गति से चला जा रहा था । इसी में रानी की योजना भी संवृद्धि और पुष्ट होती जा रही थी । कहा क्या हो रहा है, इसके समाचार उनको निरन्तर मिलते रहते थे । वह युद्ध सामग्री तैयार करने वाले कारीगरो को एकत्र करने की योजना पर, बहुत जोर देती थी—और यह हो रहा था । इस ओर रानी के जासूस और विश्वसनीय सहायक काम कर रहे थे । उस ओर नाना और राव के तथा बहादुरशाह और अवध के साथ सहानुभूति रखने वालो के लोग, अपने अपने काम में जुटे हुये थे । बिहार, बगाल में भी स्वाधीनता की आग सुलग रही थी । महाराष्ट्र, मध्यदेश, बुन्देलखण्ड उत्तर हिन्द तो मानो उसके पलने ही थे । यहा तो स्त्रिया भी काम कर रही थी । रानी ने देखा कि लोगो को इकट्ठा करने का समय आ गया है । वह जानती थी कि ऐन मौके पर तुरन्त इकट्ठा करना दुष्कर होगा, इसलिये वे सबको एक बार एकत्र करके तब योजना को आगे बढाना चाहती थी । हर काम की एक योजना वे पहले बना लेती थी, तब व्यवस्था के साथ उसको व्यवहार का रूप देती थी । इसलिये उन्होने दामोदरराव का जनेऊ करना निश्चित किया और उसके समारोह में जगह जगह से प्रमुख लोगो का, जमाव करके, आगे के कदम की बावत परामर्श करना तै किया । इस काम के लिये एक लाख रुपये की जरूरत थी नकद रुपया उनकी गाठ में न था ।