झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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रानी जब से घुडसवारी के लिये बाहर निकलने लगी, तब से वह मर्दानी पोशाक करने लगी थी—सिर पर लोहे का कुला, ऊपर साफा, उसका एक खूंट पीछे फहराता हुआ। कंचुकी के ऊपर सटा हुआ अङ्गरखा। पैजामा। अङ्गरखे और पैजामे पर कसी हुई पेटी। दोनो बगलो में पिस्तौले और दोनो ओर परतलो में तलवारें। कभी कभी इतने सब हथियारो के अलावा नेजा भी हाथ में साध लेती थी। इस पर भी घोडे को बहुत तेज चलाने में कसर नही लगाती थी। उनको काठियावाडी घोड़े अधिक पसन्द थे और सफेद रंग के खास तौर पर। घोडो की उनकी 'विलक्षण पहिचान थी। उन्हे कुला लगाकर साफा बाधने मे एक असुविधा अवगत होती थी—लम्बे केशो की। विधवा थी इसलिये महाराष्ट्र की प्रथा के अनुसार, बाल मुडवाने में कोई बाधा न थी। अपने केशो का कोई मोह था ही नही। सोचा काशी जाकर मुण्डन करा ले। पर्यटन हो जावेगा और काशी में बैठकर उस ओर की राजनैतिक परिस्थिति का आभास मिल जावेगा। एक भावना और थी—जिस घर में माता ने जन्म दिया था उसके दर्शन भी मिल जायेंगे। खोज करने पर मालूम हुआ कि बिना डिप्टी कमिश्नर की अनुमति के काशी यात्रा के लिये नही जा सकती ! अनुमति के लिये गार्डन को अर्जी दी गई। उसके पास दीवान जवाहरसिंह इत्यादि के रानी के पास आने जाने की खबरें पहुच चुकीं थी। वह चिढा हुआ था। दूसरे अपने अधिकार को करारे रूप में लाने का अभ्यासी था। काशी यात्रा के लिये जो अर्जी दी गई थी वह उसने अस्वीकृत कर दी। जिसने सुना उसी के जी को चोट लगी। 'रानी ने प्रण किया, 'मैं केश मुंडन तभी कराऊँगी, जब हिन्दुस्थान 'को स्वराज्य मिल जावेगा, नही तो स्मशान में अग्निदेव मुण्डन करेंगे।'