भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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मध्याह्न [ ४४ ] सं० १६१३ की दीवाली की गई। रीति निभाने के लिये लक्ष्मी जी का पूजन हुआ। दिये जलाये गये। नगर का बाहरी रूप जगमगा उठा। किले पर भी कुछ दिये हिन्दू मुसलमान सिपाहियो ने जलाये। लक्ष्मीबाई के शहरी महल पर भी रोशनी हुई, परन्तु हृदय सुनसान थे-वहा कोई जगमगाहट न थी। अबकी बार अङ्गरेजो के बगलो पर दिये नही जलाये गये, क्योकि अङ्गरेजो ने सोचा इस सम्पर्क से ईसाइयत को धब्बा लग जाने का अन्देशा है। इससे जनता की धारणा और पक्की हो गई—अङ्गरेज हमारे नही हैं, हमारे कभी हो ही नही सकते। मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के बसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में बिठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी। पूछा, 'आज उदास क्यो हो ? क्या बात है ?'