भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२२४ झाँसी की रानी जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुये हैं—बिठूर वाले सरदार।' मोतीबाई—'तब तो तुम्हे प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हू बिलकुल उल्टा। मुँह लटका हुआ।' जूही—'आज पहली बार ही बात हुई और रूखे बोले।' मोतीबाई—'किस प्रसंग पर।' जूही—'उन्होने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नही हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुचने पर मैं शरम मे डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोडे और चुपचाप खडी हो गई।' मोतीबाई — 'अभिनय तो बुरा नही था?' जूही— अभिनय ही तो नही था—अभिनय करना चाहा, नही कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होने भोहे सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खडी हो जाती हो? मैने तब कुछ निवेदन किया।' मोतीबाई—'वे जल्दी में होगे। उतावली कर गए......' जूही—'मुझे तो अचरज हुआ। पहले कई बार देखा-देखी हुई थी।' मोतीबाई—'आजकल मे?' जूही—'नही, कई महीने पहले जब वे कर्नल साहब के यहा आकर ठहरे थे।' मोतीबाई—'तब क्या हुआ था, मे समझी नही।' जूही—'उनको देखकर न जाने मन मे कैसी उथल-पुथल हो जाया करती थी। उन्होने देखा एक क्षण भर। उसी क्षण के भीतर कुछ इस प्रकार हेरे कि मुझको ऐसा लगा मानो घण्टो देखते रहे हो। मैने तो शीघ्र आँख हटा ली थी। फिर मकान के पास से निकले। मे आहट पाकर उनकी आँख के रास्ते में आ गई। उन्होने बहुत कम देखा, परन्तु मैं बहुत देर, बार बार, देखती रही। वे चले गये। मुझे बहुत खला। मोतीबाई—'होता है। फिर क्या हुआ?'