झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २५५ जूही—'वे यहा दो-तीन दिन रहे। मैने निरन्तर उनको अच्छी तरह देख भर लेने की कोशिश की। उन्होने देखा। मैं अघा गई। मैने फिर उनकी दृष्टि को पकडने का प्रयास किया, परन्तु वह किसी ख्याल में ऐसे मस्त थे, कि उनको जूही के मकान का भी स्मरण न रहा होगा। जिस दिन जाने लगे, मैने खिडकी में से निर्लज होकर उनको नमस्ते किया। उन्होने विना किसी लिहाज के मुस्कराकर मेरी नमस्ते का जवाव दिया।' मोतीबाई—'तब और क्या होता?' जूही—'उनको जाते-जाते कुछ सयम मिल गया। घर पर आने की कृपा की।' मोतीबाई—'यह तुमने बतलाया था।' जूही—'मै सहम गई। सिर नीचा किये खडी रह गई। बोले, यदि मुझको खुश करना चाहती हो, तो मोतीबाई जी जो कुछ काम बतलावें, उसको बहुत होशियारी के साथ किया करो। मैने हामी का सिर हिला दिया, परन्तु मुँह से बोल नही निकला। उन्होने कहा, हृदय की बात जीभ को न मालूम होने पावे। मुझको तुम्हारा हाल मालूम होता रहेगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे और वे चले गये। मैने बहुतेरा उनकी आंख के चमत्कार को देखने का प्रयत्न किया, पर वे नही मुडे। मैने उनकी पीठ को इस तरह निगाह गडाकर देखा जैसे वे देख ही रहे हो। चले गये। उसके बाद जो कुछ करती रही हू, आपको मालूम है।' मोतीबाई—'मै महारानी साहव को सुनाती रही हूँ। वे सरदार साहव को सूचना देती रहती हैं।' जूही—'अभी बीच में एक दिन के लिये और आये थे।' मोतीबाई—'हू।' जूही—'तब भी घर पर आये थे—बहुत थोडी देर के लिये। मैने निश्चय कर लिया था—उनको जी भरकर देखूंगी। न देख पाया। उन्होने कुछ बाते पूछीं। कुछ बतलाई। मेरा सिर और आंखे इतनी भारी हो गई थी, कि उठा न पाई। उनकी सुनती गई और मन्जूर करती