झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ झाँसी की रानी चली गई । नीचे नीचे जरा सा देख लेती थी, वे बात करते मुसकराते थे और मुझको मनमें गुदगुदी सी झकझोरती थी, मैं खूब हँस कर कुछ कहना चाहती थी । हँस कतई नही पाई, बात भी कम कर पाई । जो कुछ बात हुई आपको सुना दी थी, परन्तु और सब कहने का उस दिन मौका न आया था ।' मोतीबाई—'अरी पगली, इसमें उदास होने की कौनसी बात हुई ?' जूही—'नही बाई जी ! मैं जो कुछ कर रही हूँ आपके-हुकम से और अपने राजा-रानी के नमक से अदा होने के लिये । चाहे मैं मार भले ही डाली जाऊँ, परन्तु क्या वे मेरे सिर पर एक वार हाथ भी नही फेर सकते थे ?' मोतीबाई—'यह उनकी गलती है । काम करने वालो का मन रखने के लिये, बढावा देने के लिये बहुत मिठास बरसाना चाहिये ।' जूही—'वह तो आप से मुझको बहुत मिल जाता है ।' मोतीबाई—'किसी दिन रानी साहब के सामने तुमको पेश करू गी । वह बहुत देर बात करेगी ।' जूही—'मेरा जिकर तो आता होगा ?' मोतीबाई—'बहुत वार, परन्तु वे अभी बहुत लोगो से मिलना उचित नही समझती । एक दिन आवेगा, जब तुम उनकी सहेली-सेना में भर्ती हो जाओगी ।' जूही— मैं चाहती हूँ उनके कदमो में मेरा सिर कटकर गिरे ।' मोतीबाई—'सरदार साहब के पूछने पर तुमने क्या निवेदन किया ?' जूही — उनकी रुखाई से मन टूट सा गया था । इसलिये पहले तो मैं जिमीन को अँगूठे से खोदने लगी, फिर हिम्मत करके बतलाया कि फौज के हिन्दू मुसलमानो को ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है, उन्होने ब्योरा मागा । मैने कहा कि सिपाहियो को लोभ दिया जा रहा है, कि यदि वे ईसाई हो जायें तो उनका वेतन भत्ता बढा दिया जावेगा और जो सिपाही पहले ईसाई होगा उसको तुरन्त हवलदार का पद दे दिया