भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 238

लक्ष्मीबाई २२७ जावेगा । बाकी कुछ नही कह सकी, क्योकि रो डालने को जी चाहता था । यह कहकर चली आई कि फिर सुनाऊँगी, अभी पूजा करनी है । मुश्किल से लक्ष्मी-पूजन करके दिए धर कर आपके पास चली आई हूं ।' मोतीबाई ने जूही को लिपटा लिया । उसने जूही को रोने नही दिया । बोली, 'योही फुसफुसा नही जाना चाहिये देखो वे कितना कठिन और कितना नाजुक कामकर रहे हैं। नाटकशाला में जो लोग तमाशा देखने आते थे, क्या वे घर से हँसते हँसते आते थे ? ससार के दर्द को विसारने के लिये लोग नाटकशाला में बैठ जाते हैं । उनकी रुखाई या अवहेला को देखकर यदि हम लोग रंगमञ्च पर उदास या उदासीन हो जाय, तो खेल बनेगा या बिगडेगा ?' जूही ने मोतीबाई के कन्धे पर अपनी आखें छिपाकर कहा, 'रंगमंच पर हम अपने असली रूप में जाते ही कब हैं ?' मोतीबाई ने जूही की ठेस को समझ लिया । बोली, 'मै उनका जवाब तलब करूँ ?' जूही ने तुरन्त आंखे गडाकर कहा, 'आपसे कैसे बनेगा ?' मोतीबाई—'अपने को भूल जाऊँगी और अभिनेत्री बन जाऊँगी । तुम सिपाहियो के सामने क्या किसी प्रकार का भी लाज संकोच करती हो ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको मालूम ही नही पडता कि मै ऐरो- गैरो से बात कर रही हू और क्या खुराफातबके जा रही हू । आखें मेरी कुछ नही देखती-कान अलबत्ता खूब खुले रहते हैं ।' मोतीबाई—'और उनके सामने ?' जूही ने भोलेपन के साथ कहा, 'उनके सामने तो रोमाञ्च हो हो आता है-पसीना सा आ जाता है । सिट्टी सी भूल जाती है। क्या आप उनसे कुछ कहोगी ?' मोतीबाई बोली, 'आज ही मिलूँगी और कहूँगी ।' जूही ने अनुनय के साथ कहा, 'नही मेरी ओर से कुछ न कहियेगा,— कम से कम, मैने जो कुछ कहा है, वह न बतलाइयेगा । शायद मेरा भ्रम