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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

२२४ झाँसी की रानी जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुये हैं—बिठूर वाले सरदार।' मोतीबाई—'तब तो तुम्हे प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हू बिलकुल उल्टा। मुँह लटका हुआ।' जूही—'आज पहली बार ही बात हुई और रूखे बोले।' मोतीबाई—'किस प्रसंग पर।' जूही—'उन्होने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नही हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुचने पर मैं शरम मे डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोडे और चुपचाप खडी हो गई।' मोतीबाई — 'अभिनय तो बुरा नही था?' जूही— अभिनय ही तो नही था—अभिनय करना चाहा, नही कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होने भोहे सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खडी हो जाती हो? मैने तब कुछ निवेदन किया।' मोतीबाई—'वे जल्दी में होगे। उतावली कर गए......' जूही—'मुझे तो अचरज हुआ। पहले कई बार देखा-देखी हुई थी।' मोतीबाई—'आजकल मे?' जूही—'नही, कई महीने पहले जब वे कर्नल साहब के यहा आकर ठहरे थे।' मोतीबाई—'तब क्या हुआ था, मे समझी नही।' जूही—'उनको देखकर न जाने मन मे कैसी उथल-पुथल हो जाया करती थी। उन्होने देखा एक क्षण भर। उसी क्षण के भीतर कुछ इस प्रकार हेरे कि मुझको ऐसा लगा मानो घण्टो देखते रहे हो। मैने तो शीघ्र आँख हटा ली थी। फिर मकान के पास से निकले। मे आहट पाकर उनकी आँख के रास्ते में आ गई। उन्होने बहुत कम देखा, परन्तु मैं बहुत देर, बार बार, देखती रही। वे चले गये। मुझे बहुत खला। मोतीबाई—'होता है। फिर क्या हुआ?'

लक्ष्मीबाई २५५ जूही—'वे यहा दो-तीन दिन रहे। मैने निरन्तर उनको अच्छी तरह देख भर लेने की कोशिश की। उन्होने देखा। मैं अघा गई। मैने फिर उनकी दृष्टि को पकडने का प्रयास किया, परन्तु वह किसी ख्याल में ऐसे मस्त थे, कि उनको जूही के मकान का भी स्मरण न रहा होगा। जिस दिन जाने लगे, मैने खिडकी में से निर्लज होकर उनको नमस्ते किया। उन्होने विना किसी लिहाज के मुस्कराकर मेरी नमस्ते का जवाव दिया।' मोतीबाई—'तब और क्या होता?' जूही—'उनको जाते-जाते कुछ सयम मिल गया। घर पर आने की कृपा की।' मोतीबाई—'यह तुमने बतलाया था।' जूही—'मै सहम गई। सिर नीचा किये खडी रह गई। बोले, यदि मुझको खुश करना चाहती हो, तो मोतीबाई जी जो कुछ काम बतलावें, उसको बहुत होशियारी के साथ किया करो। मैने हामी का सिर हिला दिया, परन्तु मुँह से बोल नही निकला। उन्होने कहा, हृदय की बात जीभ को न मालूम होने पावे। मुझको तुम्हारा हाल मालूम होता रहेगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे और वे चले गये। मैने बहुतेरा उनकी आंख के चमत्कार को देखने का प्रयत्न किया, पर वे नही मुडे। मैने उनकी पीठ को इस तरह निगाह गडाकर देखा जैसे वे देख ही रहे हो। चले गये। उसके बाद जो कुछ करती रही हू, आपको मालूम है।' मोतीबाई—'मै महारानी साहव को सुनाती रही हूँ। वे सरदार साहव को सूचना देती रहती हैं।' जूही—'अभी बीच में एक दिन के लिये और आये थे।' मोतीबाई—'हू।' जूही—'तब भी घर पर आये थे—बहुत थोडी देर के लिये। मैने निश्चय कर लिया था—उनको जी भरकर देखूंगी। न देख पाया। उन्होने कुछ बाते पूछीं। कुछ बतलाई। मेरा सिर और आंखे इतनी भारी हो गई थी, कि उठा न पाई। उनकी सुनती गई और मन्जूर करती

२२६ झाँसी की रानी चली गई । नीचे नीचे जरा सा देख लेती थी, वे बात करते मुसकराते थे और मुझको मनमें गुदगुदी सी झकझोरती थी, मैं खूब हँस कर कुछ कहना चाहती थी । हँस कतई नही पाई, बात भी कम कर पाई । जो कुछ बात हुई आपको सुना दी थी, परन्तु और सब कहने का उस दिन मौका न आया था ।' मोतीबाई—'अरी पगली, इसमें उदास होने की कौनसी बात हुई ?' जूही—'नही बाई जी ! मैं जो कुछ कर रही हूँ आपके-हुकम से और अपने राजा-रानी के नमक से अदा होने के लिये । चाहे मैं मार भले ही डाली जाऊँ, परन्तु क्या वे मेरे सिर पर एक वार हाथ भी नही फेर सकते थे ?' मोतीबाई—'यह उनकी गलती है । काम करने वालो का मन रखने के लिये, बढावा देने के लिये बहुत मिठास बरसाना चाहिये ।' जूही—'वह तो आप से मुझको बहुत मिल जाता है ।' मोतीबाई—'किसी दिन रानी साहब के सामने तुमको पेश करू गी । वह बहुत देर बात करेगी ।' जूही—'मेरा जिकर तो आता होगा ?' मोतीबाई—'बहुत वार, परन्तु वे अभी बहुत लोगो से मिलना उचित नही समझती । एक दिन आवेगा, जब तुम उनकी सहेली-सेना में भर्ती हो जाओगी ।' जूही— मैं चाहती हूँ उनके कदमो में मेरा सिर कटकर गिरे ।' मोतीबाई—'सरदार साहब के पूछने पर तुमने क्या निवेदन किया ?' जूही — उनकी रुखाई से मन टूट सा गया था । इसलिये पहले तो मैं जिमीन को अँगूठे से खोदने लगी, फिर हिम्मत करके बतलाया कि फौज के हिन्दू मुसलमानो को ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है, उन्होने ब्योरा मागा । मैने कहा कि सिपाहियो को लोभ दिया जा रहा है, कि यदि वे ईसाई हो जायें तो उनका वेतन भत्ता बढा दिया जावेगा और जो सिपाही पहले ईसाई होगा उसको तुरन्त हवलदार का पद दे दिया

लक्ष्मीबाई २२७ जावेगा । बाकी कुछ नही कह सकी, क्योकि रो डालने को जी चाहता था । यह कहकर चली आई कि फिर सुनाऊँगी, अभी पूजा करनी है । मुश्किल से लक्ष्मी-पूजन करके दिए धर कर आपके पास चली आई हूं ।' मोतीबाई ने जूही को लिपटा लिया । उसने जूही को रोने नही दिया । बोली, 'योही फुसफुसा नही जाना चाहिये देखो वे कितना कठिन और कितना नाजुक कामकर रहे हैं। नाटकशाला में जो लोग तमाशा देखने आते थे, क्या वे घर से हँसते हँसते आते थे ? ससार के दर्द को विसारने के लिये लोग नाटकशाला में बैठ जाते हैं । उनकी रुखाई या अवहेला को देखकर यदि हम लोग रंगमञ्च पर उदास या उदासीन हो जाय, तो खेल बनेगा या बिगडेगा ?' जूही ने मोतीबाई के कन्धे पर अपनी आखें छिपाकर कहा, 'रंगमंच पर हम अपने असली रूप में जाते ही कब हैं ?' मोतीबाई ने जूही की ठेस को समझ लिया । बोली, 'मै उनका जवाब तलब करूँ ?' जूही ने तुरन्त आंखे गडाकर कहा, 'आपसे कैसे बनेगा ?' मोतीबाई—'अपने को भूल जाऊँगी और अभिनेत्री बन जाऊँगी । तुम सिपाहियो के सामने क्या किसी प्रकार का भी लाज संकोच करती हो ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको मालूम ही नही पडता कि मै ऐरो- गैरो से बात कर रही हू और क्या खुराफातबके जा रही हू । आखें मेरी कुछ नही देखती-कान अलबत्ता खूब खुले रहते हैं ।' मोतीबाई—'और उनके सामने ?' जूही ने भोलेपन के साथ कहा, 'उनके सामने तो रोमाञ्च हो हो आता है-पसीना सा आ जाता है । सिट्टी सी भूल जाती है। क्या आप उनसे कुछ कहोगी ?' मोतीबाई बोली, 'आज ही मिलूँगी और कहूँगी ।' जूही ने अनुनय के साथ कहा, 'नही मेरी ओर से कुछ न कहियेगा,— कम से कम, मैने जो कुछ कहा है, वह न बतलाइयेगा । शायद मेरा भ्रम

२३८ झाँसी की रानी ही हो । वे बुरा मान जायंगे । शायद रानी साहब बुरा मान जावें । मैं रानी साहब को अपना देवी देवता समझती हूँ ।' 'मैं मूर्ख नही हू । इस तरह न कहूँगी कि वे समझे तुमने कोई शिकायत की है । तुम्हारा काम व्योरेवार बतलाऊँगी । खुश होगे और तुमसे मिलेगे ।' 'कर्नल साहब की हवेली पर ?' मोतीबाई—'फिर कहा ? तुम्हारे मकान पर ?' जूही—'आपके मकान पर आ जाऊँगी ।' मोतीबाई—'देखू गी, वे जहा उचित समझे ।'

लक्ष्मीबाई २२६ [ ४५ ] उसी समय मोतीबाई चादर ओढकर महल गई । रानी पूजन में थी। उनको लक्ष्मी जी का इष्ट था, इसलिये और लोगो की अपेक्षा इस पूजन को वे अधिक समय देती थी। ड्योढी के एक भाग में तात्या और नाना साहब बैठे हुये थे। तात्या ने मोतीबाई को पहिचान लिया और वह तुरन्त उसको एकान्त में ले जाकर बातचीत करने लगा। तात्या ने प्रश्न किया, 'यहा का हाल अभी ठीक ठीक मालूम नही हुआ। जूही थोडी देर पहले मिली थी, परन्तु वह तो कुछ ऐसी गड गई कि कुछ कह ही नही सकी। केवल यह आश्वासन दे गई कि फिर बतलाऊँगी।' मोतीबाई ने निस्सकोच भाव के साथ उत्तर दिया, 'आप स्त्रियो की प्रकृति को नही जानते।' तात्या ने कहा, 'सुना है कि उनकी प्रकृति टेढी होती है। अभी तक इस विषय के अध्ययन करने का समय नही मिला। जब अवसर आवेगा तब समझने का प्रयत्न करूँगा।' मोतीबाई मुस्कराकर बोली, 'आप शायद ही कभी समझ सकें। परन्तु जरूरत न पडे तो अच्छा ही है। अब काम की बात सुनिये।' तात्या—'मै ध्यान लगाये हू ।' मोतीबाई — फौज के सिपाहियो को ज़बरदस्ती ईसाई बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। रामचन्द्रजी और मुहम्मद साहब, दोनो को खुलेग्राम गालियाँ दी जाती हैं। ईसाई बनने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन दिये जाते हैं एक अङ्गरेज अफसर तो यहा तक कहता था, कुछ दिनो में सारा हिन्दुस्थान ईसाई हो जावेगा। न एक मन्दिर बचेगा और न एक मस्जिद रहेगी।' तात्या—'इस तरह के समाचार सब तरफ से आ रहे हैं।' मोतीबाई—'क्या सचमुच ऐसा दिन आने वाला है ?'

३. १८५७ का स्वातन्त्र्य समर, झाँसी दुर्ग रक्षा एवं सर ह्यूरोज से भीषण संग्राम

२३० झाँसी की रानी तात्या—'विश्वास रक्खो, वह दिन कभी नही आवेगा। मुझको यह बतलाओ कि यहा के सिपाही खुद क्या भावना रखते हैं?' मोतीबाई—'मुझको पक्का भरोसा है कि एक फी सदी भी हिन्दू या मुसलमान सिपाही किसी भी लालच में आकर अपने धर्म-ईमान को नही बिगाडेगा।' तात्या—'यह तो हम सब लोग जानते हैं। मुझको यह बतलाओ कि गोरो की इस हरकत का यहा की फौज पर असर क्या पडा है?' मोतीबाई—'उनमें से कुछ तुरन्त मारना-मरना चाहते थे, परन्तु धीरज धरकर रुक गये।' तात्या—'अभी मारने-मरने का समय नही आया है। मै चाहता हूँ प्रत्येक पल्टन में से तीन अफसर, जो बिलकुल विश्वास के योग्य हो चुन लिये जावे। उनको कब और क्या करना होगा, वह दो-एक महीने पीछे बतलाया जावेगा। उनमे कह दिया जाय कि वे ईसाई तो होगे ही नही पर इस समय अपना सब्र न खो बैठें। क्रोध भरे रहे, परन्तु उसको निकलने किसी प्रकार न दे, नही तो सब किया-कराया मिट्टी में मिल जावेगा। अबकी बार आऊँगा तब जो कुछ करना है, उसकी तारीख और समय बतला जाऊँगा। आप या जूही इस काम को कर सकेंगी?' मोतीबाई—'मेरे लिये मशहूर है कि मैं बाहर बहुत कम निकलती हूँ। महलो में आती-जाती हूँ। फौज में नृत्य-गान के लिये, मेरा आना जाना तुरन्त सन्देह उत्पन्न करेगा और बाईसाहब भी यह पसन्द न करेंगी। जूही को इसी कारण महल में नही बुलाया जाता। वह बहुत अच्छा नाचती-गाती है, ईश्वर ने उसको रूप भी दिया है और ज़बरदस्त सयम। वह आपको चाहती है।' तात्या—'मुझको? मोतीबाई, यह ज़माना बुद्धि और तलवार को माजने का है, न कि मन को रस में डुबोने का।' मोतीबाई—'तब आप उसको अपने रस में डूबा रहने दीजिये। तभी तो मैंने कहा कि आप नारी-प्रकृति को नही जानते।'

लक्ष्मीबाई २३१ तात्या—'क्या नारी-प्रकृति पुरुष-प्रकृति से बहुत भिन्न होती है ?' मोतीबाई—'कह नही सकती। शायद किसी दिन आप इस विषय को समझे।' तात्या—'ऐसा नही है कि मैं नारी-प्रकृति को बिलकुल ही नही जानता हू। परन्तु सामने इतने महत्व का बड़ा काम है कि और कुछ सूझता ही नही।' मोतीबाई—'आप कृपा करके जूही से ज़रा मीठा बोलिये। एक बार उसके सिर पर शाबाशी का हाथ फेर दीजिये। वह अपने काम का कमाल कर दिखलावेगी।' तात्या—'मैने आपसे सबक लिया और गांठ बाध ली।' मोतीबाई ने हँसकर कहा, 'आपको औरतो से अभी बहुत सीखना है।' तात्या ने देखा—मोतीबाई के प्रबल सौन्दर्य में विलक्षण शोखी है और शोखी में कोई दृढ़ सत्य । हँसकर बोला, 'मानता हूँ। पर आपकी जूही को वह काम करते देखना है, जो मैंने बतलाया है।' मोतीबाई ने भी हँसकर कहा, 'मेरी नही आपकी—आप लोगो की जूही।' 'बेशक। बेशक।' बतलाइये फौज के देशी अफ़सरो पर उसका प्रभाव हो गया है ?' 'हो गया है अनेक पर।' 'इस प्रभाव को बढ़ाना है।' 'बढ़ जायगा।' 'और कोशिश यह करनी है कि अभी भड़क न उठें। जो तारीख और समय नियुक्त होगा, उसकी बाट जोहे।' 'हो सकेगा।' 'एक पल्टन के तीन अफ़सरो को खास तौर पर चुनना है।' 'मुझको जूही की बुद्धि का भरोसा है।'

२३२ झांसी की रानी 'मैं उमसे आज ही बात करूंगा । आप तो रानी साहब से बात करने के लिये ठहरेंगी ?' फिर कभी मिल लूंगी । आप मेरी बात उनसे कह दीजियेगा । मैं जाती हूं ।' मोतीबाई समझ गई थी कि तात्या इत्यादि बिलकुल एकान्त में, रानी से बातचीत करना चाहते हैं, इसलिये वह नही ठहरी । पूजन के उपरान्त नाना साहब और तात्या की भेंट रानी से हुई । रानी लक्ष्मीबाई आज बिलकुल लक्ष्मी सी भासित होती थी ।' नाना ने कहा, 'मैने अपने एक विश्वस्त आदमी अज़ीमुल्लाखा को विलायत भेजा था । अर्जी, अपील स्वीकृत नही हुई । हो जाती तो कुछ रुपया मिल जाता । कम से कम दादा साहब के ज़माने का जो छयासठ हज़ार रुपया बाकी है, वही मिल जाता । परन्तु अङ्गरेजी सरकार तो बेईमान और अन्यायी है । उसने सब नामंजूर कर दिया ! इसका अब अधिक रञ्ज नही है । रुपये की कमी पूरी हो ही जावेगी । अज़ीमुल्ला देश विदेश घूमा है । वह इटली गया, तुर्की में रहा, रूस भी पहुंचा और ईरान होकर लौट आया । उसने तुर्की के साथ चिट्ठी पत्री की है । इटली में इस समय एक प्रबल पुरुष गेरीबाल्डी नाम का है । वह अङ्गरेज़ी जहाज़ी बेडे को अपने जहाज़ी बेडे से नष्ट कर देगा । रूस से मदद मिलेगी । सब कहते हैं, कि अङ्गरेज़ हिन्दुस्थान में खुल्लमखुल्ला और आडे ओट लेकर बहुत निन्दनीय काम कर रहे हैं । बहादुरशाह बादशाह ने ईरान के शाह से लिखा पढी की है । काबुल तो हतोत्साह है, परन्तु शायद ईरान बादशाह की कुछ सहायता करे ।' रानी — 'ऊपर ऊपर इन बातो का प्रभाव अङ्गरेजो पर अच्छा पड़ेगा, परन्तु वास्तव में कार्य बहुत दृढ़ता और प्रबलता के साथ, अपने देश ही में होना चाहिये । मुझको विश्वास है कि जनता अपने साथ है । वह बहुत बड़ा बल है । अङ्गरेजो के हाथ में सीखी सिखाई हिन्दुस्थानी फौज है । वह सम्पूर्ण रूप में अपने हाथ में आ जानी चाहिये । तोप ढालने वाले

लक्ष्मीबाई २३३ और बारूद बनाने वाले कारीगर, हाथ में हो गये हैं, क्यों कि उपद्रव होते ही अङ्गरेज लोग अपना सामान नष्ट कर देगे। और फिर हम खाली तोपों से कोई काम नही कर सकेंगे।' तात्या—'प्रबन्ध कर लिया है।' रानी—'हमको ऐसी तोपे चाहनी पडे गी, जो चलते समय धक्का न दें और जल्दी गर्म न हो जावे।' तात्या—'इस प्रकार के कारीगरो को बराबर खोजा है। कुछ मिले भी हैं। खबर लगी है कि झासी में इस चतुराई वाले कारीगर हैं।' रानी—'हां हैं, मैंने कुछ इकट्ठे किये हैं। ऐसी बारूद बनाने वाले भी मैंने ढूँढे हैं, जो धुआं बहुत कम दे।' नाना—'अब ज्यादा विलम्ब नही किया जावेगा।' रानी कितने दिन और लगेगे ?' नाना—कुछ महीनो से अधिक नही।' रानी—'मेरी सम्मति में, अभी जरा और संयम और अनुशासन की आवश्यकता है।' तात्या—मैं बिलकुल मानता हूँ बाईसाहब ! परन्तु ऐसा जान पडता है कि विस्फोट जल्दी होगा। अङ्गरेज लोग हिन्दू-मुसलमान सिपाहियो को ईसाई बनाना चाहते हैं। फौज की सही हालत जानने के लिये, मैं अनेक साधन काम में ला रहा हूँ। उन सबसे एकसा ही समाचार मिल रहा है। अङ्गरेज कर्नल और कप्तान पादरी बने हुये हैं। अपने छापे की, कलो मे सहस्रो लाखो की सख्या में, छोटी बडी पुस्तके छप छाप कर, फौज में वाट रहे हैं। जिनमें हिन्दू-और मुसलमानो के धर्मों की, बेहद निन्दा की जाती है। इसके ऊपर सिपाहियो को भाति भाति के प्रलोभन, देकर, ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है। चर्बी वाले कारतूस अब भी, बन रहे हैं। पहले मैं समझता था कि बन्द कर दिये गये हैं। और चर्बी वाली बात बहुत बढा बढा कर फैलाई गई है। पर अब तो निश्चय हो गया है कि बात सच्ची है सिपाहियो को यह सब बहुत अधिक खटक रहा है।

२३४ झांसी की रानी वे धर्म के पीछे प्राण गँवाने को उठ-उठ पड़ते हैं। अब उनको बहुत अधिक रोका नही जा सकेगा।' रानी—'जब शीघ्रता करने की अटक होगी, मैं कहूंगी कि अब काम करने में आधी से होड लगाओ। तब वैसा करना। परन्तु अभी जैसे बने तैसे सयम से काम लो। नीति और युद्ध का समन्वय होना चाहिये।' नाना—'प्रयत्न तो यही किया जा रहा है। हम लोग इधर-उधर घूमते-घामते, दक्षिण के तीर्थों को जा रहे हैं। राजाओ से कम बात करेंगे, जन-नायको से मिलेगे। क्योकि बहुत दिनो तक स्वराज्य-युद्ध को चलाते रहने के लिये, हम लोगो को प्राण बुन्देलखण्ड, अवध और महाराष्ट्र से प्राप्त होगे।' तात्या—'यहा की स्त्रिया तो ऐसा काम कर रही हैं कि मैं दंग हो हो जाता हूँ।' रानी—'हां, मोतीबाई और उसकी संगिने काम कर रही हैं।' तात्या—'मोतीबाई अभी आई थी। आप पूजा में थी। उसने बत- लाया कि फौज में ईसाई मत फैलाने का किस रूप में प्रयत्न हो रहा है। हमारे और लोग भी काम कर रहे हैं। उनमें मैंने अलग खोज की थी। मोतीबाई की बातो से उनके समाचारो की पुष्टि होती है।' रानी—'मोतीबाई को यह मालूम है कि हमारे कुछ और लोग भी काम कर रहे हैं?' तात्या—'नही बाईसाहब।' नाना—'ऐसा प्रबन्ध रक्खा है कि एक विभाग वाले दूसरे विभाग वालो की बात न जान सकें।' रानी—'एक-एक पल्टन में तीन-तीन अफसर क्यो चुन रहे हो? दो-दो काफी थे।' नाना—'तीन इसलिये, कि दो दो मार दिये गये या बदल लिये गये तो काम करने के लिये एक एक तो बच ही जावेगा।'

झाँसी की रानी २३५ रानी—'तो अब आग को भड़काने की आवश्यकता नही है । उसको ढांकने की आवश्यकता है ।' तात्या—'कही कही दोनो की अटक है ।' रानी—'अङ्गरेजो ने भी जासूस छोड़ रक्खे हैं ।' नाना—'अन्तर इतना ही कि उनका जासूप विभाग, महज पैसे के लिये अपना ईमान और अपना देश बेचने को तैयार है और हम लोगो का जासूसी विभाग, कुछ भी न लेकर अपने धर्म, अपने देश और स्वराज्य के लिये, अपने तन, मन, धन को आग में झोकने के लिये प्रस्तुत हैं । पुलिस, जो शासन का सबसे अधिक प्रचण्ड कुत्ता होता है, वह भी हमारे साथ होता चला जाता है ।' रानी—'इसलिये कि हम सबके धर्म का और रोटी का सवाल है ।' नाना—'मुसलमान और भी अधिक कुढे हुये हैं । वादशाह की जो नज़र—न्योछावर ईद और नौरोज के दिन होती थी, वह तो बारह-चौदह साल से बन्द हैं । अब अङ्गरेज चाहते हैं कि बादशाह दिल्ली का लाल किला खाली करके मुङ्गेर चला जावे और गोरे लोग किले में बैठकर हिन्दुस्थान भर को लाल आंखे आराम के साथ दिखलाते रहे । जो अपने को कभी 'फिदवी खास' कह कहकर बल खाते थे, वे अब अपने को तान कर, मालिक खास कहते हैं ।' रानी—'क्या वे लोग यह सब खुल्लमख़ुल्ला कर रहे हैं ?' नाना—'बिलकुल । उनको अब कोई डर नही रहा । जनता में, विविध उपायो से, हिन्दू-मुसलमानो को लडाने का सिलसिला जारी है ।' रानी सोचने लगी । बोली, 'बहुत सावधानी और संयम से काम लेने की आवश्यकता है । हम लोगो के अपने कार्य की प्रगति के समाचार, बराबर मिलते रहने चाहिये ।' रानी ने खिड़की के बाहर दृष्टि डाली । रात कुछ अधिक गई समझ कर, ये दोनो उठ खड़े हुये और रानी का चरण स्पर्श करके चले गये ।

२३६ झाँसी की रानी यह पहला दिन था जब नाना और तात्या ने सहसा लक्ष्मीबाई के पैर छुये—यद्यपि वे दोनो आयु में उनसे बड़े थे । तात्या वहा से आकर सीधा अपने प्रवास स्थान को नही गया। पहले जूही के घर पहुचा । समय कुछ अधिक हो गया था, परन्तु जूही सोई न थी । तात्या के भीतर आते ही जूही सहमी । लाज की अरुणिमा चेहरे पर बिखर गई । तात्या ने बैठते ही मुस्कराकर कहा, 'तुमने उस समय कुछ नही बतला पाया था। मै बहुत जल्दी में था, इसलिये उतावली में ठीक तौर से पूछ भी नही पाया ।' जूही ने नीची पलको को ऊँचा किया । उसकी आखो से मोहक, मादक मधुसा छलक पडा । जरा एक ओर देखते हुये उसने कहा, 'नही कोई बात नही । मुझे लक्ष्मी पूजन के लिये घर आना था, इसलिये चली आई थी । अब सब सुनाती हू ।' वह खडी थी । तात्या के कहने पर एक ओर बैठ गई । नृत्यगान द्वारा झाँसी स्थित अङ्गरेजी सेना में वह जो कुछ किया करती थी वह उसने व्योरेवार सुनाया । जब वह बात कर रही थी, केशजूटो में बंधे हुये चमेली के फूल, हिल हिल जाते । बात की समाप्ति पर तात्या ने उठकर, जूही के सिर पर हाथ फेरा । हाथ फेरने में एक फूल टूटकर नीचे गिर पडा । तात्या ने फिर खोसने कीशिश की । जूही ने पलकें नीची किये हुये कहा, 'जाने दीजिये ।' 'वह तो मैने खोस दिया जूही,' तात्या बोला, 'मैं लक्ष्मी से मनाता हूं एक दिन आवे, जब इस देश की मुक्ति और तुम्हारे फूलो की महक का सम्मेलन हो ।'

लक्ष्मीबाई २३७ जूही खडी हो गई । आखे निश्चल रूप से खुल गईं । श्वेत भूमिकायें काली पुतलियो से प्रकाश भर सा पडा । 'यदि उस काम के करने में, मै या मेरी तरह की और स्त्रिया मर जायँ, तो इस टूटे हुये फूल की महक और देश की मुक्ति के सम्मेलन के वचन को न भूलियेगा।' जूही ने कहा। तात्या बोला 'कभी नही जूही !' जूही — 'आप जारहे हैं ? कब ? फिर कब आइयेगा ?' तात्या—'कल चला जाऊँगा । जल्दी ही आऊँगा । कब आऊंगा ? यह ठीक ठीक अभी नही कह सकता ।' तात्या नमस्ते करके चला गया । उस दिन तात्या को मालूम हुआ कि वास्तव में जूही का बोधक नाम मंगलामुखी सार्थक है ।

२३८ झाँसी की रानी [ ४६ ] जूही का छावनी में आना जाना बढ़ गया। उसके नृत्य गान की कला में और भी मोहकता आगई। परन्तु किसी सिपाही या अफ़सर में उसने अपने को बाल बराबर भी नही खोया। वे समझते थे कि जूही हृदय-हीन है। जूही को हर पल्टन मे तीन तीत उपयुक्त अफ़सर ढूँढने मे बहुत दिन नही लगे। उन अफ़सरो को यह भी मालूम हो गया कि हम लोगो को किसी दिन एक महान कार्य करना है, परन्तु उनको ठीक ठीक यह नही मालूम था कि कब। जूही स्वयं नही जानती थी। कुछ और लोग जो पल्टनो के लिये इसी कर्त्तव्य पर नियुक्त थे उनको भी मालूम न था, परन्तु वे यह जानते थे कि जूही का काम, उसी योजना का एक अङ्ग है, जिसका एक भाग उन लोगो का भी काम था। परन्तु वे एक दूसरे से मिलते न थे। निषेध था। एक दिन जूही के नृत्य-गान का आनन्द लेने के लिये कप्तान डनलप भी आ गया। एक क्षण के लिये जूही सकपकाई। परन्तु उसने अपना नियन्त्रण शीघ्र कर लिया और वह बहुत मजे में नृत्य गान करती रही। असल में डनलप को उसके जासूस ने खबर दी कि छावनी में नर्त- कियां आती हैं और अफ़सरो से दीन धर्म सम्बन्धी कुछ बाते भी किया करती हैं। इसलिये वह सहसा वहा आ गया था। नृत्य गान से उसका मन शीघ्र ऊब गया, क्योकि अधिकांश अङ्गरेजो की तरह उसको भारतीय कलाओ के प्रति उपेक्षा थी। परन्तु जूही बहुत सुन्दर थी। उसको सहज ही विश्वास न होता था कि ऐसा सौन्दर्य अपने परिधान में किसी छल कपट को छिपाये होगा। तो भी उसने सवाल किये— डनलप—'तुम छावनी से कितना पैसा कमा ले जाती हो ?' जूही—'जब जो मिल जाय हुजूर ?' डनलप—'नाचने गाने के सिवाय कोई और पेशा करती हो ?'

लक्ष्मीबाई २३६ जूही—'नही तो । मै अविवाहित हूँ । कुमारी ।' डनलप—'तुम लोगो मे विवाह भी होते हैं ?' जूही—'ज़रूर । हम लोग तो केवल नाचने-गाने का पेशा करती हैं !' डनलप—'तुम रानी साहब के यहा भी नाचने-गाने जाती हो ? मैंने सुना है कि उनको गाना सुनने और नाच देखने का शौक है ।' जूही—'मै वहा नही जाती । कभी नही गई । उनको भगवान के भजन सुनने का शौक है । नृत्य का कोई शौक नही ।' डनलप—'रानी साहब गाती हैं ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको क्या मालूम ।' डनलप—'रानी साहब ने तुमको घोडे की सवारी नही सिखलाई ?' जूही— मै उनके पास कभी जाती ही नही । घोडे की सवारी क्यो सिखलाती ?' डनलप—'और औरतो को तो सिखलाती हैं ?' जूही—'सुना है ।' डनलप—'मोतीबाई नाम की वेश्या को जानती हो ?' जूही—'वह वैश्या नही है । आपसे किसने कहा ?' डनलप—'मुझमे सवाल करती है ! जानती है कि धक्के देकर निकलवा दूंगा ।' जूही —'मैने आपका क्या बिगाडा है ?' डनलप—'अच्छा हटो । आगे कभी छावनी में मत आना ।' जूही ने मुंह उदास बना लिया और वह चली गई । परन्तु डनलप के ओट होते ही उसके होठो पर, गाली पर, मुस्कराहट की छटा छा गई । उसको याद आ गया—'एक दिन आवेगा जब फूलो की महक और देश की मुक्ति का सम्मेलन होगा ।' वह चाहती थी कि धक्के देकर निकाली जाती तो अच्छा होता, उसके शरीर से, कही से, थोड़ा-सा खून निकल पडता तो और भी अच्छा होता ।'

२४० झाँसी की रानी नर्तकी चली गई, परन्तु उसका सौन्दर्य डनलप के भीतर एक कोने में हलकी छाप, एक टीस, छोड़ गया। उस टीसने सिपाहियो के प्रति क्षोभ का रूप पकडा। डनलप बोला, 'तुम लोग इन टके वाली औरतो के मोह मे अपना पैसा और समय नष्ट करते हो। इन औरतो का झूठा जादू ही तुमको ईसाई होने से रोक रहा है। इन शैतानो को छोडकर सच्चे धर्म पर ईमान लाओ, तो मुक्ति भी मिलेगी और पैसा अलग।' पैसा और मुक्ति का घनिष्ठ सम्बन्ध सिपाही लोग बहुत दिनो से सुन रहे थे। पहले तो इस सम्बन्ध की बात पर उनको हँसी आया करती थी, अब वे खीजने लगे, जलने लगे। परन्तु सिपाहियो ने चुपचाप सुन लिया। डनलप ने सोचा उसकी बात घर कर रही है। डनलप कहता गया, 'तुम्हारे देवी-देवता सब बदसूरत और व्यर्थ हैं। उन पर विश्वास करने के कारण तुम मूर्ख बने हुये हो। इसलिये तुम्हारी तरक्की नही हो पाती। ईसाई होते ही तुमको एक ईश्वर और उसके एक पुत्र पर ही विश्वास लाने की ज़रूरत है। दुनिया भर की डाकिनी, पिशाचिनो और भूत-प्रेतो से पीछा छूट जावेगा। हिन्दू-मुसलमान सब बेवकूफ हो। इन्जील पढो तो आँखे खुल जावेगी।' सिपाहियो ने इस पर भी कुछ नही कहा। डनलप बोला, 'रिसलदार, तुमको खुद ईसाई धर्म कबूल करना चाहिये, वरना तुम्हारे हक में अच्छा नही होगा। जैसे ही कोई ईसाई अफसर मिला तुम, बरखास्त कर दिये जाओगे।' रिसालदार ने कहा, 'जो हुकुम।' डनलप समझा, 'रिसालदार ईसाई होने के लिये लगभग राजी हो गया है। पूछा, 'कब तक?' रिसालदार ने उत्तर दिया, 'कुछ महीनो की ही कसर है हजूर!' डनलप इस वाक्य के भीतरी अर्थ को नही समझा।

डनलप के जाते ही सारा सिपाही समज व्यङ्ग और क्षोभ में प्रमत्त हो गया। सुरीली और रूप वाली नर्तकी के अपमान का उनको रञ्ज था। अपने धर्म की अवहेलना पर उनको क्रोध था और अङ्गरेज के मुँह से रानी का नाम तक लेने पर, उनको क्षोभ था। 'उस विचारी को धक्के देकर निकालने की धमकी दी ! वडा हूश है।' 'अरे पाजी है। कहता है, धर्म-ईमान छोड दो। ये शराबी कबाबी धर्म-ईमान को क्या जाने।' 'मेरी तबियत में तो आ गया था कि पौदो पर दुलत्ती कस दूँ।' 'जरा ठहरो। समय आरहा है। फिलहाल मनाही है। सहते जाओ। थोडी सी कसर रह गई है। हमारे मुखिया लोग इलाज सोच रहे हैं।' 'खाक सोच रहे हैं। जब धर्म न रहेगा, मन्दिर मसजिद साफ हो जावेगे, तब हकीमजी इलाज करने आवेगे।' 'कारतूस फिर जारी किये गये हैं। सुनता हू, कलकत्ते के कारखाने में लाखो करोड़ो की तादाद में बनाये जा रहे है और एक अङ्गरेज या ईसाई को चार आना सेर के हिसाब से, गाय और सुअर की चर्बी इकट्ठी करके कारखाने मे देने का ठेका भी दे दिया गया है।' 'आने दो आने दो कारतूसो को। जीते जी तो उन कारतूसो को छुयेंगे नही। और यदि खोलने के लिये मजबूर किये गये, तो पहली गोली इस पाजी डनलप पर।' 'ईश्वर एक है सो तो बिलकुल ठीक है। न हिन्दू इसके खिलाफ कुछ मानते हैं और न मुसलमान। लेकिन ईश्वर के एक ही बेटा हुआ यह कुर्सीनामा इस डनलप को कहा से मालूम हुआ ?' 'जिस कारखाने से भ्रष्ट कारतूस निकले, उसी से इस तरह का मजहब निकला होगा।' 'हमारे यहाँ ईसा को पैगम्बर माना गया है, लेकिन खुदा का बेटा नही माना गया।' 'उसके बेटे तो मियाँ हम सब लोग हैं।'

२४२ झाँसी की रानी 'यह डनलप असल में अपने और अपने अङ्गरेज भाइयो के सिवाय किसी को खुदा का बेटा नही मानता।' 'हाय न जाने वह दिन कब आवेगा!' 'बहुत दिनो अपने ही भाइयो से लडे और इन लोगो के बहकाने से उनको तबाह किया।' 'कहते हैं हमारा निमक खाते हो, निमक की बजाना--हम कहते हैं निमक तुम्हारे वाप का है?' 'बेशक है। ये लोग अगर कुर्सीनामे में से सावित करदे कि ये खुदा के नाती पोते पन्ती वन्ती कुछ हैं तो बेशक है।' 'यह तो हम लोग सावित कर सकते हैं क्योकि हम उसकी पूजा करते हैं, उसके कदमो में नमाज़ कहते हैं, लेकिन ये लोग—मौका मिला और शराब गटकी, क्लब घर में पहुचे और नाचे मटके। इतवार को गिरजा में सातवे दिन जाकर तोवा करली और फिर वही रफ्तार जारी।' 'कूडा हम साफ करे और मोटी मोटी तनख्वाहे ये मारे।' 'हम हिन्दुस्थानी सिपाहियो की वारक देखो और इन के बंगले। हमारी रोटी, चपाती और दाल देखो और इनके अन्डे बिस्कुट। हमारी छोटी सी तनख्वाह देखो और इनका मुहरो का ढेर, जो रोज़ रोज़ विलायत चला जा रहा है।' 'और इस पर बदमाशो की 'डैमफूल'। तहज़ीब के साथ बात करना जानते ही नही। इनका मुल्क तो बिलकुल हब्शी है।' 'सबको तबाह कर दिया। झासी की देवी को देखो, किस मुसीबत में अपने दिन गुज़ार रही है।' 'मिया तुमने देवी सच कहा। एक दिन कमासिन टौरिया की तरफ घोडा दौडाये जा रही थी। मेरी आंखो में चकाचोध लग गई। जी चाहता था कि पैर छू लूं।' 'सच कहता हूँ डनलप सरीखे शेखीबाज़ो को तो वह एक तमाचे में ढीला करदे।'

लक्ष्मीबाई २४३ 'न जाने वह दिन कब आवेगा कि फिर रानी का झण्डा किले पर फहरावे ।' 'किले में गोरो की वसीगत देखकर मेरा तो खून जल उठता है ।' 'लोगो को किले में जाने की मनाही है ।' 'जब हमारा राज हो जावेगा, हम इन लोगो को किले की हवा के पास भी न फटकने देंगे ।' 'महीना, तारीख, वक्त कुछ मुकर्रर हुआ ?' 'चुप, चुप, अभी नही । ठहरे रहने का हुक्म है । इन्तज़ार करने का ।' 'अब तो सहा नही जाता । कब तक अपने धर्म और मजहव की तौहीन वरदास्त करते रहे ?'