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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २३६ जूही—'नही तो । मै अविवाहित हूँ । कुमारी ।' डनलप—'तुम लोगो मे विवाह भी होते हैं ?' जूही—'ज़रूर । हम लोग तो केवल नाचने-गाने का पेशा करती हैं !' डनलप—'तुम रानी साहब के यहा भी नाचने-गाने जाती हो ? मैंने सुना है कि उनको गाना सुनने और नाच देखने का शौक है ।' जूही—'मै वहा नही जाती । कभी नही गई । उनको भगवान के भजन सुनने का शौक है । नृत्य का कोई शौक नही ।' डनलप—'रानी साहब गाती हैं ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको क्या मालूम ।' डनलप—'रानी साहब ने तुमको घोडे की सवारी नही सिखलाई ?' जूही— मै उनके पास कभी जाती ही नही । घोडे की सवारी क्यो सिखलाती ?' डनलप—'और औरतो को तो सिखलाती हैं ?' जूही—'सुना है ।' डनलप—'मोतीबाई नाम की वेश्या को जानती हो ?' जूही—'वह वैश्या नही है । आपसे किसने कहा ?' डनलप—'मुझमे सवाल करती है ! जानती है कि धक्के देकर निकलवा दूंगा ।' जूही —'मैने आपका क्या बिगाडा है ?' डनलप—'अच्छा हटो । आगे कभी छावनी में मत आना ।' जूही ने मुंह उदास बना लिया और वह चली गई । परन्तु डनलप के ओट होते ही उसके होठो पर, गाली पर, मुस्कराहट की छटा छा गई । उसको याद आ गया—'एक दिन आवेगा जब फूलो की महक और देश की मुक्ति का सम्मेलन होगा ।' वह चाहती थी कि धक्के देकर निकाली जाती तो अच्छा होता, उसके शरीर से, कही से, थोड़ा-सा खून निकल पडता तो और भी अच्छा होता ।'

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