झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ झाँसी की रानी [ ४६ ] जूही का छावनी में आना जाना बढ़ गया। उसके नृत्य गान की कला में और भी मोहकता आगई। परन्तु किसी सिपाही या अफ़सर में उसने अपने को बाल बराबर भी नही खोया। वे समझते थे कि जूही हृदय-हीन है। जूही को हर पल्टन मे तीन तीत उपयुक्त अफ़सर ढूँढने मे बहुत दिन नही लगे। उन अफ़सरो को यह भी मालूम हो गया कि हम लोगो को किसी दिन एक महान कार्य करना है, परन्तु उनको ठीक ठीक यह नही मालूम था कि कब। जूही स्वयं नही जानती थी। कुछ और लोग जो पल्टनो के लिये इसी कर्त्तव्य पर नियुक्त थे उनको भी मालूम न था, परन्तु वे यह जानते थे कि जूही का काम, उसी योजना का एक अङ्ग है, जिसका एक भाग उन लोगो का भी काम था। परन्तु वे एक दूसरे से मिलते न थे। निषेध था। एक दिन जूही के नृत्य-गान का आनन्द लेने के लिये कप्तान डनलप भी आ गया। एक क्षण के लिये जूही सकपकाई। परन्तु उसने अपना नियन्त्रण शीघ्र कर लिया और वह बहुत मजे में नृत्य गान करती रही। असल में डनलप को उसके जासूस ने खबर दी कि छावनी में नर्त- कियां आती हैं और अफ़सरो से दीन धर्म सम्बन्धी कुछ बाते भी किया करती हैं। इसलिये वह सहसा वहा आ गया था। नृत्य गान से उसका मन शीघ्र ऊब गया, क्योकि अधिकांश अङ्गरेजो की तरह उसको भारतीय कलाओ के प्रति उपेक्षा थी। परन्तु जूही बहुत सुन्दर थी। उसको सहज ही विश्वास न होता था कि ऐसा सौन्दर्य अपने परिधान में किसी छल कपट को छिपाये होगा। तो भी उसने सवाल किये— डनलप—'तुम छावनी से कितना पैसा कमा ले जाती हो ?' जूही—'जब जो मिल जाय हुजूर ?' डनलप—'नाचने गाने के सिवाय कोई और पेशा करती हो ?'